'बच्चे फ़ुटबॉल नहीं हैं जो एक स्कूल से दूसरे स्कूल फेंके जाऐ'

प्रभाकर मिश्रा, नई दिल्ली (22 जुलाई): ग़रीब बच्चों को पढ़ाना बड़े स्कूलों को कैसे नागवार गुज़रता है इसका बानगी आज सुप्रीम कोर्ट में देखने को मिली। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद जिन 13 बच्चों को लखनऊ के प्रतिष्ठित सिटी मोंटेसरी ने एडमीशन दिया था उन बच्चों को स्कूल अपने यहाँ पढ़ाने से अब क़तरा रहा है। स्कूल ने सुप्रीम कोर्ट से कहा कि लखनऊ में और भी स्कूल हैं वहाँ बच्चों को भेजा जा सकता है लेकिन सिटी मोंटेसरी बच्चों को नहीं रखना चाहता। जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने तल्ख़ अंदाज में कहा " बच्चे फ़ुटबॉल नहीं है कि इधर से उधर फेंके जाऐं"।

शिक्षा के अधिकार क़ानून के तहत सरकारी, ग़ैरसरकारी और निजी स्कूलों को गरीब बच्चों को 25 फ़ीसदी सीटें देने का नियम है। लेकिन प्रतिष्ठित और मंहगे स्कूल में शामिल सिटी मोंटेसरी स्कूल ने गरीब बच्चों को ये कहते हुए एडमीशन से इंकार कर दिया कि लखनऊ में कई और स्कूल हैं जहाँ बच्चों के दाख़िले हो सकते हैं फिर मोंटेसरी स्कूल ही क्यों। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने कुछ महीने पहिले आदेश दिया कि मोंटेसरी स्कूल 13 गरीब बच्चों को एडमीशन दें और उन्हें पढ़ाये।

इस आदेश के बात स्कूल नें एडमीशन तो दे दिया लेकिन स्कूल सुप्रीम कोर्ट पहुँच गया। स्कूल की तरफ़ से पेश वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवीं ने कोर्ट के सामने तर्क दिया कि लखनऊ में कई और स्कूल हैं जो इन गरीब बच्चों के घरों के पास हैं। इसलिए इन बच्चों को उन स्कूलों में शिफ़्ट किया जा सकता है। हालाँकि इसी बीच यूपी सरकार के वकील एम शमशाद ने साफ शब्दों में कहा कि बच्चों को स्कूल से बाहर नहीं निकला जाना चाहिए। यूपी सरकार ने बच्चों को मोंटेसरी स्कूल में ही रखने का निर्णय लिया है।

स्कूल के रवैये से नाराज़ कोर्ट ने कहा कि बच्चे फ़ुटबॉल नहीं हैं जिन्हें इधर से उधर फेंका जाऐ। कोर्ट ने स्कूल और यूपी सरकार दोनों को लिखित जवाब पेश करने को कहा है।