''पर्सनल लॉ की वैधता नहीं जांच सकता सुप्रीम कोर्ट''

दिव्या अग्रवाल, नई दिल्‍ली (6 फरवरी): मुस्लिम महिलाओं के अधिकार पर एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट और मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड आमने-सामने है। एक ओर जहां सुप्रीम कोर्ट मुस्लिम महिलाओं के अधिकार को लेकर खुद संज्ञान लेकर सुनवाई शुरु की है तो वहीं मुसलमानों के संगठन जमीयत उलमा ने कहा है कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के बीच सुप्रीम कोर्ट को आने का हक नहीं है।

जमीयत उलमा ए हिंद ने पर्सनल लॉ का हवाला देते हुए महिलाओं के अधिकारों की सुनवाई का विरोध किय़ा है। जमीयत ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट, मुस्लिम पर्सनल लॉ में शादी, तलाक और गुजारे भत्ते के मामले पर सुनवाई नहीं कर सकता। पर्सनल लॉ ने महिलाओं को पर्याप्त अधिकार दिए हैं। लॉ पवित्र कुरान पर आधारित है, इसके मौलिक अधिकारों को सुप्रीम कोर्ट में नहीं परखा जा सकता।

दरअसल सुप्रीम कोर्ट ने मुस्लिम महिलाओं के अधिकार और पत्नी के रहते हुए भी पति की दूसरी, तीसरी और चौथी शादी पर स्वतः संज्ञान लिया था। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में अटार्नी जनरल को जवाब दाखिल करने को कहा है। लेकिन जमात ए उलेमा ने इसके खिलाफ ही अर्जी दे दी है।

जमात-ए-उलेमा के इसी रुख ने नई बहस छेड़ दी है। सवाल उठ रहे हैं कि सुप्रीम कोर्ट जो कि देश की सर्वोच्च न्यायालय है, क्या उससे भी बड़ा हो गया है मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और आखिर क्यों मुसलमानों को अलग कानून हो।