जाएं तो जाएं कहां : सऊदी अरब तेल संकट का सबसे बुरा असर विदेशी मजदूरों पर

नई दिल्ली (10 अगस्त) : पहले उन्हें वेतन मिलना बंद हुआ। फिर काम मिलना। फिर वो दो वक्त के खाने को भी मोहताज हो गए। वो सऊदी अरब की झुलसा देने वाली गर्मी में सीमेंट के कैंपों में रहने को मजबूर हैं। दवा भी मिलना दो महीने पहले बंद हो गया। यहां बात की जा रही है सऊदी अरब के कैंपों में फंसे दक्षिण एशियाई कामगारों की।

दरअसल जिन कंस्ट्रक्शन कंपनियों में ये काम करते थे, वहीं से उनका भुगतान अटका हुआ है। ये अपनी खून-पसीने की कमाई जल्दी मिलने की आस में ही यहां टिके हुए हैं। उसे छोड़कर वो स्वदेश लौटने के लिए तैयार नहीं हैं। कंस्ट्रक्शन कंपनियों का कहना है कि उनका भुगतान सरकारी विभागों की ओर से अटका हुआ है।  

बता दें  कि तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमतें धड़ाम होने से सऊदी अरब का पूरा आर्थिक ढांचा चरमरा गया है। कंस्ट्रक्शन कंपनियों का काम ठप हो जाने की वजह से भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश जैसे दक्षिण एशियाई देशों के हज़ारों मजदूर यहां फंसे हुए हैं। कोई उन्हें ठीक से बताने वाला नहीं है कि हालात में कब तक सुधार आएगा।   

फाइनेंशियल पोस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक बांग्लादेश के डक्ट फैब्रीकेटर मोहम्मद सलाहलदीन रियाद के एक लेबर कैंप में रहने को मजबूर है। उनका कहना है कि जिस उन्हें उनका बकाया मिल जाएगा, उसी दिन वे अपने वतन लौट जाएंगे।

आर्थिक पाबंदियों के चलते सऊदी अधिकारी कंस्ट्रक्शन पर बहुत कम खर्च कर रहे हैं। साथ ही कॉन्ट्रैक्टर्स को भी बहुत देर से उनके काम की पेमेंट मिल रही है। दरअसल सऊदी अरब में प्राइवेट बिजनेस का बड़ा हिस्सा दशकों से सरकार से मिलने वाले ठेकों पर निर्भर रहा है। अब तेल के झटके की वजह से सबसे बड़ा नुकसान विदेशी कामगारों को भुगतना पड़ रहा है। ये वहीं कामगार हैं जो बहुत कम वेतन पर काम कर देश की अर्थव्यवस्था को रफ्तार देते रहे हैं।

एक अनुमान के मुताबिक बेरोजगार हो गए 16,000 ऐसे कामगार सिर्फ भारत और पाकिस्तान से ही हैं। बताया जा रहा है कि इन्हें 8-8 महीने से वेतन नहीं मिला है। इन कामगारो को एक्जिट वीज़ा भी नहीं मिल पा रहा है। इसमें मालिक ही कामगारों के लिए एग्जिट वीज़ा का इंतज़ाम करते हैं। लेकिन ये तभी मिलता है जब मालिक कामगारों के एक-एक पैसे का भुगतान कर चुका होता है।