सरदार पटेल ने कामयाब नहीं होने दी अंग्रेजों की यह चाल


नई दिल्ली (31 अक्टूबर): भारत को देश के विभाजन की कीमत पर आजादी मिली थी। अंग्रेजों ने ऐसी चाल चली थी कि भारत टुकड़ों में बिखर जाए, लेकिन अगर आज हिंदुस्तान कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक एकजुट है तो उसके पीछे लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल के वो फैसले हैं जो उन्होंने देश के पहले गृहमंत्री के रूप में लिए। वो रणनीति है, जिसे पूरा करने के लिए उन्होंने साम-दाम और दंड-भेद सबका इस्तेमाल किया।

आजादी के ठीक बाद जम्मू कश्मीर को भारत में शामिल करवाने की चुनौती बहुत बड़ी थी। हिंदुस्तान का ताज कश्मीर आजादी के ठीक बाद हिंदुस्तान का हिस्सा नहीं था। अंग्रेजों ने देश के राजे-रजवाड़ों को भारत या पाकिस्तान में विलय करने या फिर आजाद होने का विकल्प दिया था। हैदराबाद और जूनागढ़ के साथ ही जम्मू कश्मीर वो तीसरी रियासत थी, जिसके राजा ने भारत में शामिल होने पर हामी नहीं भरी थी।

पाकिस्तान चाहता था कि बहुसंख्यक मुस्लिम आबादी वाले कश्मीर के हिंदू राजा हरि सिंह पाक में शामिल होने के लिए हां कर दें, लेकिन हरि सिंह इसके लिए तैयार नहीं थे। दूसरी तरफ भारत में विलय को लेकर भी महाराजा हामी नहीं भर रहे थे। जम्मू-कश्मीर के राजा हरि सिंह के तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित नेहरू से संबंध ठीक नहीं थे। इसे देखते हुए पटेल ने खुद हरि सिंह को मनाने की जिम्मेदारी ली। सरदार ने महाराजा को विश्वास दिलाया कि उनके सम्मान का पूरा ख्याल रखा जाएगा। उन्हें ये भी समझाया कि अगर उन्होंने आजाद होने का फैसला किया तो पड़ोसी पाकिस्तान उनके लिए कितना बड़ा खतरा बन सकता है।

इस बीच 20 अक्टूबर 1947 को पाकिस्तानी कबायलियों ने कश्मीर पर हमला बोल दिया। इन आक्रमणकारियों ने जमकर उत्पात मचाया। वे श्रीनगर के पास तक पहुंच चुके थे। अब जम्मू-कश्मीर के राजा हरि सिंह को समझ आ गया था कि सरदार पटेल की सलाह कितनी सही थी। बिना देर किए हरि सिंह ने 27 अक्टूबर 1947 को विलय के कागजात पर दस्तखत कर दिए। जिसके बाद भारतीय फौज ने जम्मू-कश्मीर में सैन्य कार्रवाई कर पाकिस्तानी कबायलियों को खदेड़ दिया।

लेकिन विलय के कुछ ही दिन बाद जब तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित नेहरू ने पाक के साथ युद्धविराम समझौते का ऐलान करते हुए कश्मीर मुद्दे में संयुक्त राष्ट्र की मध्यस्थता के प्रस्ताव पर हामी भर दी। जनमत परीक्षण पर भी हां कर दी तो गृहमंत्री पटेल इसका विरोध करने से नहीं चूके। इसके कुछ ही दिन बाद 3 जनवरी 1948 को सरदार पटेल ने कोलकाता में कश्मीर पर ऐतिहासिक भाषण दिया।

जम्मू-कश्मीर के मुद्दे पर बाद के दौर की तमाम सरकारों ने सरदार पटेल की नीति पर ही अमल किया और तीसरे पक्ष के दखल को मंजूरी नहीं दी। 69 साल बाद आज भी अगर सरदार हर हिंदुस्तानी के दिल पर राज कर रहे हैं तो इसके पीछे लौहपुरुष के वो फैसले हैं जिन्होंने शक्तिशाली और समर्थ भारत के निर्माण की नींव डाली।