रियो ओलंपिक: साक्षी-सिंधु ने बचाई नाक, बाकी ने किया बेड़ा गर्क

  नई दिल्ली (21 अगस्त): तीन महिला खिलाड़ियों के उम्मीद से बढ़कर चमकने के साथ ही कुछ अच्छी, कुछ बुरी और कुछ भयानक यादों के साथ रियो ओलिंपिक में भारत का सफर समाप्त हो गया। हर मुश्किल को पीछे छोड़ते हुए पीवी सिंधु और साक्षी मलिक ने भारत को रियो से खाली हाथ नहीं लौटने दिया और पूरे देश की शान बन गईं। सिंधु, साक्षी और दीपा की तिकड़ी कई मामलों में पहले नंबर पर रही। ओलिंपिक मेडल जीतने वाली सबसे युवा भारतीय 21 साल की सिंधु ने बैडमिंटन में पहला मेडल जीता। साक्षी कुश्ती में मेडल जीतने वाली पहली महिला बनीं। दीपा महज 0.15 पॉइंट्स से ब्रॉन्ज जीतने से चूक गईं, लेकिन प्रोदुनोवा वॉल्ट में चौथे स्थान पर रहकर उन्होंने पूरे देश का दिल जीत लिया।

इस ओलिंपिक में मैदान पर भी भारतीय खिलाड़ियों का प्रदर्शन उम्मीद और प्रतिष्ठा के अनुरूप नहीं रहा। 15 खेलों में अब तक सबसे ज्यादा 118 खिलाड़ियों के साथ खेल रहा भारत इस बार 2012 के लंदन ओलिंपिक जितने छह मेडल भी नहीं जीत पाया। 2004 के एथेंस ओलिंपिक के बाद पहली बार ऐसा हुआ जब भारतीय निशानेबाज खाली हाथ वापस लौटे हों।

भारतीय मुक्केबाजों का प्रदर्शन भी पिछले आठ साल में सबसे खराब रहा। अब तक आठ गोल्ड मेडल जीतने वाली भारतीय पुरुष हॉकी टीम 36 साल बाद क्वॉर्टर-फाइनल में जगह बनाने में सफल रही, लेकिन बेल्जियम से 1-3 से हारकर इसके आगे नहीं बढ़ पाई। वहीं 36 साल बाद ओलिंपिक में शिरकत कर रही महिला हॉकी टीम क्वॉर्टर-फाइनल तक भी नहीं पहुंच पाई।

टेनिस में एक बार फिर विवाद खेल से ज्यादा चर्चित रहा। रेकॉर्ड सातवीं बार ओलिंपिक खेल रहे लिएंडर पेस रोहन बोपन्ना के साथ टेनिस डबल्स खेलने वाले थे, लेकिन वह समय पर पहुंचे ही नहीं। दोनों खिलाड़ी पर्याप्त प्रैक्टिस नहीं कर पाए और पहले ही राउंड से बाहर हो गए। विमिन्ज डबल्स में भी सानिया मिर्जा और प्रार्थना थंबोर की जोड़ी पहले ही राउंड में बाहर हो गई। इसके बाद मिक्स्ड डबल्स में सानिया और बोपन्ना की जोड़ी ने भारत की मेडल की उम्मीद बढ़ा दी थी, लेकिन ब्रॉन्ज मेडल के प्ले-ऑफ में यह जोड़ी चेक खिलाड़ी स्टेपानेक और लूसी से हार गई।

तीरंदाजी में भारत का प्रदर्शन निराशाजनक रहा। दीपिका कुमारी एक बार फिर कोई कमाल दिखाने में नाकाम रहीं। तीरंदाजी की टीम स्पर्धा में भारतीय महिलाएं रूस की जोड़ी से शूट-ऑफ में हार गईं। भारत को सबसे बड़ी निराशा शूटिंग में हुई, जहां 2008 में अभिनव बिंद्रा ने गोल्ड और 2012 में भारत ने दो मेडल जीते थे। रियो ओलिंपिक में भारतीय शूटर पूरी तरह नाकाम रहे और खाली हाथ घर लौटे। दुनिया के तीन नंबर के खिलाड़ी जीतू राय ने 10 मीटर एयर पिस्टल इवेंट में भारत के लिए उम्मीदें जगाई थीं, लेकिन आठवें स्थान पर रहते हुए बाहर हो गए। इसके बाद 50 मीटर पिस्टल इवेंट, जिसमें उन्होंने इस साल बैंकॉक में वर्ल्ड कप गोल्ड जीता था, उसमें भी जीतू पदक नहीं दिला पाए। अपने पांचवे और आखिरी ओलिंपिक में बिंद्रा मेडल के बेहद करीब आए, लेकिन महज 0.5 पॉइंट्स के अंतर से चौथे स्थान पर रह गए। लंदन में ब्रॉन्ज जीतने वाले गगन नारंग कोई भी छाप छोड़ने में नाकाम रहे।

महिलाओं में हिना सिद्धू, अयोनिका पॉल और अपूर्वी चंदेला भी शूटिंग में भारत को कोई मेडल नहीं दिलवा पाईं और शुरुआती दौर में ही बाहर हो गईं। नैशनल राइफल असोसिएशन ऑफ इंडिया के प्रेजिडेंट रनिंदर सिंह ने कहा कि ऐथलीट्स के लिए व्यक्तिगत कोचों की नियुक्ति करने की वजह से ऐसी हार का मुंह देखना पड़ा। जब ओलिंपिक समाप्त होने में सिर्फ चार दिन बचे थे और मेडल न मिलने की टीस बेहद बढ़ गई थी, तब रोहतक की लगभग गुमनाम रेसलर 23 साल की साक्षी ने कुश्ती में भारत को ब्रॉन्ज मेडल दिलाया। उनके अलावा रियो गए योगेश्वर दत्त से भारत को बड़ी उम्मीद थी, लेकिन योगेश्वर आखिरी दिन हुए कुश्ती मुकाबले में पहले मैच में ही हार गए।