नहीं बच सकी जिया; लाखों की फीस के बाद भी बच्चों की ज़िंदगी की गारंटी नहीं!

मनु मेहता, प्रभाकर मिश्र, गुरुग्राम (18 मई): ये कहानी एक ऐसी घटना की हैं जो किसी भी देश के लिए दुर्भाग्यपूर्ण है। लेकिन ये आईना रखना हमारी मजबूरी है। क्योंकि ये देश के भविष्य का सवाल है। अपने बच्चों के साथ हमारे सलूक का सवाल है। गुड़गांव के रेयान स्कूल की एक बस सात साल की एक बच्ची को गलत स्टॉप पर उतार देती है। बच्ची अकेले सड़क पार करने लगती है। पीछे से आती एक कार उसे कुचलकर निकल जाती है। और नौ दिन बाद उसकी मौत हो जाती है। आपको तकलीफ होगी लेकिन जिया के आसपास एक भी ज़िम्मेदार आदमी मौजूद होता तो वो सही सलामत घर पहुंच जाती। 

बिल्कुल ऐसे ही रेयान स्कूल की बस से कंडक्टर ने उतारा था जिया को। लेकिन उसके नन्हें कदमों को थामने के लिए मां नहीं मौत मौजूद थी। सात साल की बच्ची नौ दिन तक लड़ी लेकिन कब तक लड़ती। पिता ने पैसे पानी की तरह बहा दिए लेकिन जिया को वापस नहीं पा सके। अस्पताल से उसका बेजान जिस्म लौटा तो पूरा घर फूट पड़ा। 

जिया बिल्कुल हमारे आपके घरों जैसी एक आम सी बच्ची थी। पिता अपनी हैसियत से बढ़कर उसकी परवरिश पर पैसे खर्च कर रहे थे। रेयान इंटरनेशनल जैसे नामी और महंगे स्कूल में दाखिला करवाया था। सिर्फ इसी भरोसे पर कि पैसे से उनकी फूल सी बच्ची को शिक्षा सुविधा और सुरक्षा तीनों मिलेगी। उसकी हिफाजत की गारंटी पर स्कूल बस की मोटी रकम चुका रहे थे। बस स्टॉप पर जिया की मम्मी उसे खुद लेने आती थी। लेकिन नौ मई की दोपहर रेयान इंटरनेशनल के ड्राइवर ने जिया को मौत की मंज़िल पर उतार दिया। 

गुरुग्राम के रेयान इंटरनेशन स्कूल की तीसरी क्लास में पढ़ने वाल जिया स्कूल बस से वापस अपने घर आ रही थी। मां बस स्टॉप पर इंतजार कर रही थी। लेकिन रेयान स्कूल की बस रोज के स्टॉप से आगे रुकी, जिया को उतारकर रेयान स्कूल की बस चली गई। 7 साल की जिया अकेले ही सड़क पार करने लगी। पीछे से आ रही तेज़ रफ्तार कार ने उसे टक्कर मार दी। जिया को गुरुग्राम के मेदांता हॉस्पिटल में भर्ती करवाया गया। वो 9 दिनों तक कोमा में रही। और फिर वापस नहीं लौटी।

इस घटना के बाद प्राइवेट स्कूलों के रवैये पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। कि रेयान इंटरनेशल जैसे पांच सितारा स्कूल का लाइसेंस क्यों नहीं रद्द कर दिया जाए? आखिर ऐसे लोगों को स्कूल चलाने का क्या हक है जो बच्चों की ज़िंदगी की कीमत ही नहीं समझते। जो फूल से बच्चों के साथ सिटी बस का मुसाफिर समझते हैं। जो लाखों रुपया फीस वसूलते हैं और बच्चों की ज़िंदा घर पहुंचाने तक की गारंटी नहीं लेते। 

जिस स्कूल में लाखों रुपए खर्च करके हर मांबाप इस उम्मीद में अपने बच्चों का दाखिला करवाता है कि वो पैसों के दम पर सुऱक्षित हाथों में हैं वो ऐसा कैसे कर सकते हैं। पिता ने आरोप लगाया कि- रेयान स्कूल पर ये आरोप हैं कि बस के ड्राइवर को रुट की जानकारी ही नहीं थी। ड्राइवर के साथ न कंडक्टर था न कोई सहायक। बच्ची को रोज़ से अलग बस स्टॉपर पर उतारा बिना अभिभावक के आए बस रवाना हो गई। इस वाजिब आरोप के बाद भी कई सवाल हैं जो हमारे अपने ऊपर हैं। हम स्कूल और ड्राइवर को कसूरवार ठहराकर एक नागरिक के तौर पर अपनी जवाबदेहियों से खुद को बरी नहीं कर सकते। ऐसा भी तो हो सकता था कि हम सब जिया के गुनहगार हैं!

गलत जगह पर उतर भी गई थी तो पास के लोग उसका खयाल रख लेते। कोई जिम्मेदार आदमी 7 साल की बच्ची को सड़क पार करवा देता या कार चलाने वाला सड़क पार करती बच्ची को देखकर रुक जाता। अफसोस लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। कोई एक वजह नहीं है कि हम कह दें कि जिया के गुनहगार ये हैं। दरअसल जिया के गुनहगार हम सब हैं.। हमारी व्यवस्था है। हमारे ट्रैफिक के ढीले ढाले नियम कायदे हैं। हमारी नहीं सुधरने की जिद है। और जब तक हम नहीं सुधरेंगे जिया को खोते रहेंगे।