जानें यूक्रेन और रूस के बीच तनातनी की वजह जो बनेंगे युद्ध का कारण

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न्यूज 24 ब्यूरो, मुंबई (3 दिसंबर): रूस पर इस वक्त खून सवार है और यूक्रेन को तबाह और बर्बाद करने के लिए पुतिन किसी भी हद को पार करने को तैयार है। यूक्रेन रुस के तांडव से बचने के लिए नाटो से मदद मांग रहा है। एक बार फिर यूक्रेन में रुस 2014 जैसा नरसंहार मचाने का षडयंत्र रच रहा है। बस वो चाहता है कि एक बार यूक्रेन उसकी सेना पर हमला कर दे, उसके बाद पुतिन की सेनाएं यूक्रेन के लिए यमराज बन जाएंगी।बार-बार दुनिया में ये सवाल उठता है किआखिर रुस और यूक्रेन के बीच जंग के हालात क्यों बनते रहते हैं। जबकि रुस और यूक्रेन का 1991 में एक साथ उदय हुआ था, जब सोवियत संघ के 1991 में टुकड़े हुए थे। असल में रूस इस बात को लेकर यूक्रेन से बहुत नाराज है कि वो पश्चिमी देशों से अच्छे संबंध क्यों बना रहा है। रूस इसे अपने लिए खतरा मानता है। यही कारण है कि यूक्रेन पश्चिम और रूस की खींचतान के बीच फंसा हुआ है। यूरोप का दूसरा सबसे बड़ा देश यूक्रेन, रूस की आंखों में ऐसे खटक रहा है, जैसे मानों कोई कांटा हो।रूस चाहता है कि यूक्रेन एक ऐसा देश बना रहे हैं जो उसके इशारों पर विदेशी और व्यापारिक फैसले ले, लेकिन यूक्रेन इसके लिए बिल्कुल तैयार नहीं हैं। यूक्रेन की उपजाऊ जमीन और व्यापार पर रूस आंख गड़ाए सालों से बैठा है। यही वजह की रूस किसी भी कीमत पर यूक्रेन से युद्ध करना चाहता था। राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने साफ कर दिया है कि यूक्रेन में जब तक वर्तमान सरकार सत्ता में है, तब तक पूर्वी यूकेन में संघर्ष समाप्त होने की कोई सूरत नहीं है। यही वजह है कि रूस की फौजे पूरी तैयारी करने में युद्ध स्तर पर जुटी हुई हैं।रूस यूक्रेन के पीछे काफी सालों से पड़ा है। साल 2014 में रूस की ओर झुकाव रखने वाले यूक्रेन के राष्ट्रपति विक्टर यानुकोविच के ख़िलाफ़ पश्चिम की ओर झुकाव रखने वाली सरकार में विद्रोह के स्वर उठे थे। इस जबरदस्त विद्रोह में रूस ने यूक्रेन में तबाही मचा दी थी। यूक्रेन में अल्पसंख्यक रुसियों के होने का भी रूस ने जमकर फायदा उठाया। इन अल्पसंख्यक रुसियों ने रूस के इशारे पर यूक्रेन में जमकर मार-काट मचाई थी। रूस के इस नरसंहार में 77 से ज्यादा लोग फरवरी 2014 में मारे गए थे, जबकि विशेषज्ञों के मुताबिक चार साल पहले यूक्रेन की सरकार के खिलाफ रूसी अलगावादियों के संघर्ष में, अब तक 10 हजार से ज्यादा लोगों की जानें जा चुकी हैं। इनमें से एक तिहाई आम नागरिक हैं।रूस ने इस मौक़े का फ़ायदा उठाते हुए क्रीमियाई प्रायद्वीप पर क़ब्ज़ा कर लिया था और विद्रोही गुटों ने पूर्वी यूक्रेन के हिस्सों पर नियंत्रण कर लिया। जनआंदोलनों के कारण राष्ट्रपति विक्टर को तो पद छोड़ना पड़ा था मगर तब तक रूस ने क्रीमिया पर क़ब्ज़ा करके उसका विलय रूस में करा दिया था। इस संघर्ष से पश्चिमी देशों के साथ रूस के रिश्ते संबंध तनावपूर्ण हो गए हैं। इन देशों का आरोप था कि क्रीमिया पर कब्जे के कारण 2014 में संघर्ष शुरू किया गया। यूक्रेन में इस वक्त जबरदस्त राष्ट्रवाद की आंधी चल रही है। यूक्रेन का हर युवा, खुद को युद्ध की तैयारी में झोंक चुका है। शहरों में युद्ध की तैयारियों को लेकर रैलियां निकाली जा रही हैं। यूक्रेन के राष्ट्रपति समेत पूरा देश एक तरह से रुस के खिलाफ युद्ध के मोर्चे पर पहुंच चुके हैं।यूक्रेन के पास खोने को कुछ नहीं बचा है। अगर युद्ध में उसने रूस की फौजों को मात दे दी तो उसकी जनता सुनहरा भविष्य दुनिया देखेगी। लेकिन अगर रूस के खौफनाक हमले यूक्रेन पर भारी पड़ गए, तो हो सकता है कि दुनिया के नक्शे से यूक्रेन का नामों-निशान मिट जाए। राष्ट्रपति पुतिन ने साफतौर पर अपने जनरलों को आदेश दे दिया है कि यूक्रेन के खिलाफ पूरी ताकत से हमला किया जाए, किसी भी कीमत पर यूक्रेन को हल्के में ना लिया जाए।