जनसंघ के सह-संस्थापक बलराज मधोक का निधन

नई दिल्ली (2 मई): भारतीय जनसंघ के संस्थापकों में से एक बलराज मधोक का निधन हो गया है। बलराज मधोक उन्नीस सौ साठ के दशक के वरिष्ट राजनेता थे। वे संसद (लोकसभा) के दो बार सदस्य रहे। साथ ही वे शिक्षाविद, विचारक, इतिहासवेत्ता, लेखक एवं राजनीतिक विश्लेषक भी रहे। उन्होंने 30 से ज्यादा किताबें भी लिखीं। उनकी किताबों में 'विभाजित भारत में मुस्लिम समस्या का पुनरोदय', 'कश्मीर : जीत में हार', 'खण्डित कश्मीर' और 'जीत या हार' ने काफी चर्चा बटोरीं।

(दाएं से बलराज मधोक, अटल बिहारी वाजपेयी और बचराज व्यास)​

मधोक का जन्म 25 फरवरी 1920 को जम्मू एवं काश्मीर राज्य के अस्कार्डू (Askardu) में हुआ था। उनकी उच्च शिक्षा लाहौर विश्वविद्यालय में हुई। 18 साल की उम्र में उन्होंने अपने छात्रजीवन में ही वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सम्पर्क में आये। सन 1942 में भारतीय सेना में सेवा (कमीशन) का प्रस्ताव ठुकराते हुए उन्होने आर एस एस के प्रचारक के रूप में देश की सेवा करने का व्रत लिया। 

मधोक की बात से जब नाराज हो गए आडवाणी फरवरी, 1973 में कानपुर में जनसंघ की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सामने एक नोट पेश किया। उस नोट में मधोक ने आर्थिक नीति, बैंकों के राष्ट्रीयकरण पर जनसंघ की विचारधारा के उलट बातें कही थीं। इसके अलावा मधोक ने कहा था कि जनसंघ पर आरएसएस का असर बढ़ता जा रहा है। 

मधोक ने संगठन मंत्रियों को हटाकर जनसंघ की कार्यप्रणाली को ज्यादा लोकतांत्रिक बनाने की मांग भी उठाई थी। लालकृष्ण आडवाणी उस समय जनसंघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष थे। वे मधोक की इन बातों से इतने नाराज हो गए कि आडवाणी ने मधोक को पार्टी का अनुशासन तोड़ने और पार्टी विरोधी गतिविधियों में शामिल होने की वजह से उन्हें तीन साल के लिये पार्टी से बाहर कर दिया गया। यह तब था जब मधोक उन लोगों में शुमार हैं जिन्होंने आडवाणी को जनसंघ की राजनीति में स्थापित करवाया था। इस घटना से बलराज मधोक इतने आहत हुए थे कि फिर कभी नहीं लौटे।

(अटल बिहारी वाजपेयी के साथ दाएं बलराज मधोक)

बलराज मधोक ने करीब चार साल पहले दिए गए इंटरव्यू में कहा था कि अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी ने हिंदू हितों को सबसे ज्यादा चोट पहुंचाई है। वे अब भी आडवाणी-वाजपेयी की आलोचना करते हैं। वाजपेयी के बारे में मधोक ने कहा, 'जब मैंने संसद में चीन के सख्त तेवर को लेकर नेहरू की आलोचना की तो वाजपेयी मेरे पास आए मुझसे कहा कि मैं कभी भी लोकसभा के लिए दोबारा नहीं चुना जाऊंगा। उस समय आचार्य कृपलानी मेरे पास ही बैठे थे। कृपलानी ने मुझसे कहा उन्हें (वाजपेयी) को गंभीरता से मत लो क्योंकि वे विपक्ष में नेहरू के प्लांटेड आदमी हैं।' मधोक ने दावा किया कि दीन दयाल उपाध्याय के जोर देने पर उन्होंने आडवाणी को जनसंघ के केंद्रीय संगठन में जगह दी थी।  

(एलके आडवाणी के साथ दाएं बलराज मधोक )

तीखी आलोचना के बाद भी इंदिरा ने उन्हें दिया था कैबिनेट का ऑफर  बलराज मधोक का दावा किया था कि इंदिरा गांधी की तीखी आलोचना के बावजूद उनकी किताबें पढ़ने के बाद इंदिरा गांधी ने 1980 में सत्ता में वापसी करने के बाद मधोक को अपनी कैबिनेट में शामिल करने के लिए संदेश भिजवाया था। 

एक इंटरव्यू में मधोक ने इस बारे में कहा, 'इंदिरा के प्रस्ताव को लेकर मैं बहुत उत्साहित नहीं था। लेकिन कुछ समय बाद मेरे पास संजय गांधी का संदेश आया कि वे मुझसे मिलना चाहते हैं। 23 जून, 1980 को एक जगह पर हम दोनों की मुलाकात भी निश्चित हुई। लेकिन उसी दिन सुबह हुए हादसे में संजय की मौत हो गई। मुझे इंदिरा गांधी के प्रस्ताव को गंभीरता से लेना चाहिए था। मैं कभी संजय के बेटे वरुण गांधी से मिलना चाहता हूं।'

मधोक जनसंघ के जनता पार्टी में विलय के खिलाफ थे। 1979 में उन्होंने 'भारतीय जनसंघ' को जनता पार्टी से अलग कर लिया। उन्होंने अपनी पार्टी को बढ़ाने की हर संभव कोशिश की, लेकिन सफलता हासिल नहीं हुई।