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नया नहीं है कांग्रेसी नेताओं का RSS के कार्यक्रम में जाना

पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी आरएसएस के कार्यक्रम में हिस्सा लेने के लिए नागपुर पहुंच चुके हैं। यहां वो आरएसएस कार्यकर्ताओं को संबोधित करेंगे, लेकिन इस कदम को लेकर बहुत बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। कांग्रेस के कई बड़े नेता प्रणब

नई दिल्ली (7 जून): पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी आरएसएस के कार्यक्रम में हिस्सा लेने के लिए नागपुर पहुंच चुके हैं। यहां वो आरएसएस कार्यकर्ताओं को संबोधित करेंगे, लेकिन इस कदम को लेकर बहुत बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। कांग्रेस के कई बड़े नेता प्रणब मुखर्जी के इस कदम पर सवाल उठा रहे हैं।30 जनवरी 1948 दुनिया के इतिहास की एक अमिट तारीख है, लेकिन इस तारीख का सीधा नाता आरएसएस और कांग्रेस के बीच कड़वे रिश्तों से भी है। ये वो तारीख थी जिस दिन नाथूराम गोडसे ने महात्मा गांधी की हत्या की थी। इस जघन्य हत्याकांड के तत्काल बाद आरएसएस के तत्कालीन सरसंघचालक गोलवलकर ने गंभीर शोक प्रकट किया। लेकिन 5 दिन बाद ही 4 फरवरी 1948 को नेहरू सरकार ने आरएसएस पर प्रतिबंध लगा दिया।तत्कालीन नेहरू सरकार को गांधी हत्याकांड में आरएसएस की भूमिका संदिग्ध लगी थी। नतीजा गुरू गोलवलकर समेत 20 हज़ार कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार कर लिया गया। गुरू गोलवलकर और हजारों संघ के कार्यकर्ता जेलों में थे। संघ की गतिविधियों को नेहरू सरकार ने खत्म सा कर दिया था, लेकिन 6 महीने जेल में रहने के बाद गोलवलकर 5 अगस्त 1948 को रिहा कर दिए गए। इसके बाद उन्होने आरएसएस से प्रतिबंध हटाने के लिए कई कोशिशें कीं। इसके लिए उन्होंने तत्कालीन गृहमंत्री सरदार पटेल को कई पत्र लिखे।ऐसे ही एक पत्र के जवाब में सरदार पटेल ने गोलवलकर को लिखा,''भाई श्री गोलवलकर,आपका खत मिला जो आपने 11 अगस्त को भेजा था। जवाहरलाल ने भी मुझे उसी दिन आपका खत भेजा था। इस बात में कोई शक नहीं है कि संघ ने हिंदू समाज की बहुत सेवा की है। जिन क्षेत्रों में मदद की आवश्यक्ता थी, उन जगहों पर आपके लोग पहुंचे और श्रेष्ठ काम किया है। मुझे लगता है कि इस सच को स्वीकारने में किसी को भी आपत्ति नहीं होगी, लेकिन सारी समस्या तब शुरू होती है जब ये ही लोग मुसलमानों से प्रतिशोध लेने के लिए कदम उठाते हैं। उन पर हमले करते हैं। इसके अलावा देश की सत्ताधारी पार्टी कांग्रेस पर आप लोग जिस तरह के हमले करते हैं, उसमें आपके लोग सारी मर्यादाएं, सम्मान को ताक पर रख देते हैं। राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ पर प्रतिबंध को छह महीने से ज्यादा हो चुके हैं। हमें ये उम्मीद थी कि इस दौरान संघ के लोग सही दिशा में आ जाएंगे, लेकिन जिस तरह की खबरें हमारे पास आ रही हैं उससे तो यही लगता है कि जैसे संघ अपनी नफरत की राजनीति से पीछे हटना ही नहीं चाहता। मुझे पूरा भरोसा है कि संघ के लोग कांग्रेस के साथ मिलकर ही देशहित में काम कर पाएंगे न कि हमसे लड़कर। मुझे इस बात की प्रसन्नता है कि आपको रिहा कर दिया गया है। मुझे उम्मीद है कि आप सही फैसला लेंगे।''आपकावल्लभ भाई पटेलपटेल के इस पत्र को आधार बता कर आज भी कई इतिहासकारों का मानना है कि पटेल ने इशारों ही इशारों में संघ को कांग्रेस में मिलने की नसीहत दी थी, जिसे गोलवलकर ने स्वीकार नहीं किया। आरएसएस पर प्रतिबंध के दौरान गोलवलकर ने कई बार दिल्ली में नेहरू से मिलने की कोशिश की, लेकिन नेहरू ने उन्हें मना कर दिया। आखिरकार गोलवलकर ने आरएसएस पर से प्रतिबंध हटाने के लिए 9 दिसंबर 1948 को सत्याग्रह शुरु किया, जिसमें 60 हज़ार संघ कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया गया। आखिरकार नेहरू सरकार ने 11 जुलाई 1949 को आरएसएस पर से प्रतिबंध हटा दिया।50 के दौर में आरएसएस प्रतिंबध के बाद संभल चुका था। उसने अपनी राजनैतिक ताकत मजबूत करने के लिए भारतीय जनसंघ की स्थापना की और इसी के साथ नेहरू सरकार व संघ के बीच टकराव का नया दौर शुरू हुआ। नेहरू सरकार की तमाम नीतियों को गुरू गोलवलकर और संघ नेताओं की कटु आलोचना झेलनी पड़ती थी। लेकिन 1962 तक आते-आते हालात बदलने लगे। इसी साल चीन ने भारत पर आक्रमण कर दिया। भारत इसके लिए तैयार नहीं था। इस संकट की घड़ी में आरएसएस के कार्यकर्ताओं ने सरकारी कार्यों में और खासतौर से जवानों की मदद में पूरी ताकत लगा दी। संघ के इस कदम से पूरे देश उसकी छवि और बेहतर हुई।आरएसएस के मुखर विरोधी तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू भी इससे प्रभावित हुए। उन्होंने 1963 में 26 जनवरी की परेड में संघ को शामिल होने का निमंत्रण दिया। परेड करने वालों को आज भी महीनों तैयारी करनी होती है, लेकिन मात्र दो दिन पहले मिले निमंत्रण पर करीब साढ़े तीन हज़ार स्वयंसेवक गणवेश में उपस्थित हो गए। उस वक्त नेहरू के इस फैसले की कई लोगों ने आलोचना की।तब नेहरू ने कहा, ''ये दर्शाने के लिए कि केवल लाठी के बल पर भी सफलतापूर्वक बम और चीनी सेना से लड़ा सकता है, इसी वजह से 1963 के गणतंत्र दिवस परेड में भाग लेने के लिए आरएसएस को अचानक आमंत्रित किया गया।''

नेहरू युग बीतने के बाद जब लालबहादुर शास्त्री का दौर आया तो संघ को लेकर सरकार की सोच में काफी बदलाव आ चुका था। लालकृष्ण आडवाणी ने अपनी किताब माई कंट्री, माइ लाइफ में लिखा है, ''नेहरू की तरह आरएसएस के खिलाफ शास्त्री जी कोई वैचारिक विरोध नहीं रखते थे। उनके मन में आरएसएस के प्रति नफरत का भाव नहीं थी। शास्त्री जी अक्सर राष्ट्रीय मुद्दों पर सलाह-मशवरे के लिए गुरू गोलवलकर को आमंत्रित करते थे।''1965 में पाकिस्तान से युद्ध के समय लालबहादुर शास्त्री ने भी संघ को याद किया था। शास्त्री क़ानून-व्यवस्था की स्थिति संभालने में मदद देने और दिल्ली का ट्रैफिक अपने हाथ में लेने के लिए संघ कार्यकर्ताओं को बुलाया था ताकि पुलिसकर्मियों को सेना की मदद में लगाया जा सके। संघ के इस काम की उस समय की सरकार ने प्रशंसा भी की। 60 का दशक बीत रहा था। इंदिरा गांधी देश की सत्ता के केंद्र में थीं। तब तक आरएसएस भी एक बड़ी ताकत बन चुका था। इसी दौर में आरएसएस के प्रेरण स्त्रोत माने जाने वाले सावरकर का 1966 में निधन हो गया। तब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने सावरकर के निधन पर कहा था, ''सावरकर आधुनिक भारत की एक महान विभूति थे, जिनका नाम साहस और देशभक्ति का पर्याय बन चुका था। सावरकर ने एक महान क्रांतिकारी के रूप में उन्होंने अनेक युवाओं को मातृभूमि को स्वतंत्र कराने के काम में लगने की प्रेरणा दी।'' इतना ही नहीं इंदिरा गांधी के कार्यकाल के दौरान सावरकर पर भारत सरकार ने एक डाक टिकट भी जारी किया।1971 में जब इंदिरा गांधी पाकिस्तान को पस्त कर दिया तो उस समय के संघ के नेताओं ने उनकी दिल खोलकर तारीफ की थी, लेकिन 1974 में जेपी के नेतृत्व में छात्र आंदोलन शबाब पर पहुंचा तो इसके पीछे भी संघ-शक्ति थी। संघ से जुड़ा छात्र संगठन एबीवीपी सक्रिय तौर पर आंदोलन से जुड़ा था, लेकिन संघ पूरे आंदोलन में परदे के पीछे था। संघ की दलील थी कि चूंकि ये आंदोलन इंदिरा सरकार के ख़िलाफ़ है, इसलिए वो किसी राजनीतिक आंदोलन का हिस्सा नहीं बन सकता।

जेपी आंदोलन की वजह से इंदिरा गांधी ने इमरजेंसी लगाई और अटल बिहारी वाजपेयी व लाल कृष्ण आडवाणी जैसे जनसंघ के नेताओं को जेल में डाल दिया गया, लेकिन नानाजी देशमुख अंडरग्राउंड हो गए। अंडरग्राउंड रहकर इन लोगों ने इंदिरा सरकार के ख़िलाफ़ काम किया और जब इमरजेंसी के बाद 1977 में आम चुनाव हुए तो जेपी के असर में जनसंघ में जनता पार्टी का विलय हो चुका था। लेकिन जनता पार्टी के टूटने के साथ जनसंघ ने अपना रास्ता अलग कर लिया और देश के राजनीतिक नक्शे पर भारतीय जनता पार्टी का उदय हुआ। ये वही पार्टी थी, जिसके अंदर हिंदू राष्ट्रवाद था और बाहर, जनता पार्टी का एजेंडा।इसी दौर में एक वक्त ऐसा भी आया जब इंदिरा गांधी आरएसएस के साथ दिखीं। 1977 में RSS के वरिष्ठ स्वंयसेवक एकनाथ रानाडे के आमंत्रण पर इंदिरा गांधी ने विवेकानंद रॉक मेमोरियल का उद्घाटन किया था। आज जब पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी आरएसएस के समारोह में शरीक हो रहे हैं तो इंदिरा के इस कदम की बार-बार बात हो रही है।इंदिरा और राजीव के दौर में आरएसएस और कांग्रेस का वैचारिक टकराव कई मुद्दों पर होता रहा, लेकिन 1992 में एक ऐसी घटना हुई, जिसके बाद कांग्रेस के लिए संघ हमेशा-हमेशा के लिए अछूत हो गया। 6 दिसंबर के अयोध्या कांड के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिम्हाराव ने आरएसएस पर प्रतिबंध लगा दिया हालांकि बाद में ये प्रतिबंध हट गया़ लेकिन कांग्रेस और आरएसएस की दूरिया आज ऐसे दौर में आ चुकी हैं, जहां ये दो धाराएं शायद ही कभी मिलें और ये बात राहुल और सोनिया के बयानों से साफ हो जाती है।

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