'सम्राट अशोक की वजह से भारत का हुआ पतन, फिर भी कहे जाते हैं महान'

नई दिल्ली (1 जुलाई) :  संघ परिवार के निशाने पर मुगल बादशाह अकबर के बाद अब सम्राट अशोक भी आ गए हैं। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, आरएसएस से जुड़ी एक पत्रिका में दावा किया गया है कि अशोक के बौद्ध धर्म अपना लेने और अहिंसा को बढ़ावा देने के कारण भारत की सीमाएं विदेशी आक्रमणकारियों के खुल गई।

राजस्‍थान वनवासी कल्‍याण परिषद की ओर से छपने वाली किताब ‘बप्‍पा रावल’ में अशोक पर आरोप लगाया गया है कि अशोक के राज में बौद्ध धर्म ने देशद्रोह का काम करते हुए यूनानी आक्रांताओं की मदद की। उनका सोचना था कि ऐसा होने से वैदिक धर्म समाप्‍त हो जाएगा और बौद्ध धर्म का दबदबा बढ़ेगा।

राजस्‍थान वनवासी कल्‍याण परिषद संघ परिवार आदिवासी विंग वनवासी कल्‍याण आश्रम से संबद्ध है। वनवासी कल्‍याण आश्रम का मुख्‍यालय छत्‍तीसगढ़ में है। किताब में छपे आर्टिकल में बौद्ध अपनाने से पहले अशोक की महानता का जिक्र किया गया है। हालांकि इसमें आगे लिखा गया कि धर्मांतरण के बाद अशोक ने अहिंसा से जुड़े सिद्धांतों का कुछ ज्‍यादा ही प्रचार किया।

लेख के अनुसार, ”यह भारत का दुर्भाग्‍य था कि सम्राट अशोक जो भारत की अवनति का कारण बने उन्‍हें महान के रूप में पूजा जाता है। बेहतर होता यदि भगवान बुद्ध की तरह सम्राट अशोक भी राजपाट छोड़ देते, साधु बन जाते और बौद्ध धर्म का प्रचार करते। ऐसा होने पर भारत को कठिनाई नहीं झेलनी पड़ती। लेकिन ऐसा करने के बजाय उन्‍होंने पूरे देश साम्राज्‍य को बौद्ध धर्म के प्रचार का केंद्र बना दिया। मगध के बौद्ध नेताओं के कारण यूनानी आक्रांता भारत पर फिर से कब्‍जा करने आए। बौद्ध साधुओं ने अपने अनुयायियों में यह देशद्रोहपूर्ण और भारत विरोधी प्रचार किया कि बौद्ध धर्म देश या जाति को नहीं मानता। जब भी बौद्ध धर्म से सहानुभूति रखने वाले विदेशी आक्रमणकारियों ने भारत पर हमला किया तो बौद्धों ने लड़ने के बजाय उनका साथ दिया।”

यह लेख पत्रिका में ‘भारत: कल, आज और कल’ श्रृंखला का हिस्‍सा है। इस बारे में एडिटर डॉ. राधिका लड्ढ़ा ने ब‍ताया कि उनका मतलब बौद्धों या सम्राट अशोक या किसी और पर आरोप लगाने का नहीं था। उन्‍होंने कहा, ”मैं यही कहना चाहती थी कि हमारे पूर्वज महान बुद्धि के धनी थे बावजूद इसके हमारे देश को उनकी छोटी-छोटी गलतियों के कारण इतना कुछ झेलना पड़ा। मैंने बौद्धों को राष्‍ट्रद्रोही नहीं कहा।” राजस्‍थान वनवासी कल्‍याण परिषद की स्‍थापना 1978 में हुई थी। यह राजस्‍थान के छह आदिवासी जिलों में काम करती है। इसके तहत रेजीडेंशियल स्‍कूल, अस्‍पताल और खेल प्रशिक्षण केंद्र चलाए जाते हैं।