आनंदीबेन ने आखिर क्यों दिया इस्तीफा? एक नज़र में पूरा सफर

नई दिल्ली (1 अगस्त): गुजरात की मुख्यमंत्री आनंदीबेन ने सोमवार को पद से अचानक इस्तीफा देकर सभी को हैरान कर दिया। इस्तीफे के वक्त उन्होंने कहा, कि दो साल से पार्टी में ऐसी परंपरा है कि 75 से ऊपर के सदस्य बड़े पदों से खुद मुक्त हो रहे हैं। वह इसी परंपरा को आगे बढ़ा रही हूं। लेकिन अचानक हुए इस्तीफे पर कई तरह के सवाल उठ रहे हैं।

हाल में ऐसा रहा गुजरात का राजनैतिक माहौल - गुजरात में चल रहे आंदोलनों को लेकर राज्य पर सरकार का पूरा नियंत्रण ना होने की बात कही जा रही थी। - आनंदीबेन के मुख्यमंत्री रहते गुजरात में पाटीदार आंदोलन और दलित आंदोलन ने सिर उठाया। - 2014 के चुनावों में केंद्र में बीजेपी की जीत के बाद जब नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने तो आनंदीबेन को गुजरात में अपना उत्तराधिकारी बनाया था।

आनंदीबेन के पूरे सफर पर एक नज़र 

- राजनीति में आने से पहले आनंदी बेन अहमदाबाद के मोहिनीबा कन्या विद्यालय में प्रधानाचार्य थीं। - राजनीति में उनका का प्रवेश 1987 में स्कूल पिकनिक के दौरान एक दुर्घटना की वजह से हुआ। - हुआ यूं कि स्कूल पिकनिक के दौरान दो छात्राएं नर्मदा नदी में गिर गईं। - उन्हें डूबता देख आनंदीबेन भी उफनती नदी में कूद पड़ीं और दोनों को ज़िंदा बाहर निकाल लाईं। - इसके लिए आनंदीबेन को राज्य सरकार ने वीरता पुरस्कार से नवाज़ा। - इस घटना के बाद आनंदीबेन के पति मफतभाई पटेल, जो उन दिनों गुजरात भाजपा के कद्दावर नेताओ में से एक थे, के दोस्त नरेंद्र मोदी और शंकरसिंह वाघेला ने उन्हें भाजपा से जुड़ने और महिलाओं को पार्टी के साथ जोड़ने के लिए कहा। - बस उसी साल आनंदीबेन, गुजरात प्रदेश महिला मोर्चा अध्यक्ष बनकर, भाजपा में शामिल हो गईं। - पार्टी में उन दिनों कोई मजबूत महिला नेता नहीं थी इसलिए कुछ ही दिनों में भाजपा में आनंदीबेन एक निडर नेता के तौर पर उभरीं। - राजनीति में आने के सात वर्ष बाद ही 1994 में वह गुजरात से राज्यसभा की सांसद बनीं। - उसके बाद 1998 के विधानसभा चुनाव में वह बतौर विधायक गुजरात के मांडल इलाक़े से चुनी गईं और केशुभाई पटेल की सरकार में उन्हें शिक्षा मंत्री बनाया गया। - वह हमेशा से ही मोदी के नज़दीक रहीं। - 1995 में शंकरसिंह वाघेला का विद्रोह हो या 2001 में केशुभाई को पद से हटाने की बात हो, आनंदीबेन हमेशा मोदी के साथ खड़ी रहीं। - मोदी सरकार में आए उसके बाद कुछ दिनों तक शिक्षा मंत्री रही आनंदीबेन को शहरी विकास और राजस्व मंत्री बनाया गया। - वह राज्य सरकार की कई और समितियों की भी अध्यक्ष थीं। - यह बात काम ही लोग जानते हैं कि टाटा नैनो को ज़मीन देने की बात हो या नर्मदा नहर के लिए किसानों से ज़मीन लेने का काम, इन सबके पीछे आनंदीबेन का हाथ था। - गुजरात राज्य की कई और नीतियां, जिनके लिए मोदी ने वाहवाही लूटी है, उनके पीछे आनंदीबेन ही हैं। फिर चाहे वह ई-ज़मीन कार्यक्रम हो, जमीन के स्वामित्व डाटा और जमीन के रिकॉर्ड को कंप्यूटरीकृत करके जमीन के सौदों में होने वाली धांधली को रोकने की बात हो, या फिर गुजरात के 52 प्रतिशत किसानों के अंगूठे के निशानों और तस्वीरों का कंप्यूटरीकरण कर देने की बात हो।