'यहां रहता था असली मोगली... 2 रुपये रोज पर फिल्म में किया था काम'

नई दिल्ली (6 मार्च):  अब से 60 साल पहले एक आदिवासी बच्चे चेंदरू की एक बाघ के साथ ऐसी दोस्ती हो गई थी और वह उसी के साथ खाता-पीता, खेलता और सोता था। इस रियल स्टोरी पर एक स्वीडिश डायरेक्टर ने फिल्म भी बनाई थी। जिसने चेंदरू को इंटरनेशनल 'स्टार' बना दिया था। चेंदरू मंडावी मुरिया जनजाति का लड़का था और बस्तर क्षेत्र के नारायणपुर जिले के गढ़बेंगाल गांव का रहने वाला था।

 बचपन में ही उसके पिता और दादा ने एक बाघ का बच्चा लाकर उसे दिया तो चेंदरू उसी के साथ दोस्त की तरह रहने लगा। वह उसे ‘टेम्बू’ बुलाता था। आदमखोर जानवर और आदमी के बच्चे की अनोखी दोस्ती की चर्चा ईसाई मिशनरियों के जरिए स्वीडन के ऑस्कर विनर फिल्म डायरेक्टर आर्ने सक्सडॉर्फ तक पहुंची। सक्सडॉर्फ ने चेंदरू पर फिल्म बनाने की सोची और पूरी तैयारी के साथ बस्तर पहुंच गए। उन्होंने चेंदरू को ही फिल्म के हीरो का रोल दिया और यहां रहकर दो साल में शूटिंग पूरी की।

1957 में फिल्म रिलीज हुई- 'एन द जंगल सागा', जिसे इंग्लिश में ‘दि फ्लूट एंड दि एरो’ के नाम से जारी किया गया। इस फिल्म में 10 साल के चेंदरू ने बाघों और तेंदुओं के साथ काम किया था और उसकी मजदूरी थी रोज के दो रुपए। फिल्म में दिखाया गया कि चेंदरू का दोस्त गिंजो एक तेंदुए को मारने के दौरान मारा जाता है, जिसके बाद किसी तरह चेंदरू की दोस्ती तेंदुओं और बाघों से हो जाती है। फिल्म को 1958 में कान फिल्म फेस्टिवल में प्रदर्शित किया गया।

फिल्म के रिलीज होने के बाद चेंदरू को भी स्वीडन और बाकी देशों में ले जाया गया। उस दौरान वह महीनों विदेश में रहा। वह जहां-जहां भी जाता था, उसकी एक झलक पाने के लिए लोग उमड़ पड़ते थे। फिल्म का संगीत देने वाले पं. रविशंकर तब अपनी पहचान बनाने के लिए स्ट्रगल कर रहे थे और लोग उन्हें चेंदरू के संगीतकार के तौर पर जानने लगे थे।