3 नहीं 4 साल हो आरबीआई के गवर्नर का कार्यकाल: राजन

संजीव त्रिवेदी, नई दिल्ली (30 जून): तमाम विवादों के बीच अब तक खामोशी बरतते रहे आरबीआई गवर्नर रघुराम राजन ने अपनी जुबान खोल ही दी। विवादों पर अपना नजरिया उन्होंने सीधे तो नहीं रखा, लेकिन वित्तमंत्रालय की संसदीय समिति की बैठक में राजन ने कहा कि आरबीआई गवर्नर का 3 साल का कार्यकाल बहुत ही छोटा है और नीतियों को लागू करने के लिए पर्याप्त नहीं।

अपने कार्यकाल के आखिरी दौर में विवादों में घिरने के बावजूद चुप्पी साधे रहने वाले रघुराम राजन ने अपने मन की बात कह दी है। वित्त मंत्रालय पहुंचे और अरुण जेटली से मुलाकात भी की, लेकिन मुलाकात के बाद जाते हुए वे हर सवाल को टाल गए, जैसे किसी भी विवाद पर वो कुछ बोलना ही नहीं चाहते।

दुनिया के सबसे बेहतरीन सैंट्रल बैंक गवर्नर के तौर पर सम्मानित रघुराम राजन हाल में सुब्रमण्यम स्वामी के निशाने पर रहे। अपने बारे में प्रधानमंत्री मोदी की सकारात्मक सोच के बीच उन्होंने विवादों पर सीधे तो कुछ नहीं बोला, लेकिन जब वो वित्त मंत्रालय की संसदीय समिति की बैठक में पहुंचे जहां उन्हें भारतीय अर्थव्यवस्था के मौजूदा हालत पर एक प्रजेंटेशन देना था और यहीं बातों-बातों में उनके मन की बात छलक गई।

सूत्रों के अनुसार उन्होंने कहा कि आरबीआई गवर्नर का 3 साल का कार्यकाल प्रस्तावित कार्यों को पूरा करने के लिए बहुत ही कम है। उनका कहना था कि दुनिया भर में सेंट्रल बैंक के गवर्नरों को इससे अधिक समय का कार्यकाल मिलता है, जिससे वे अर्थव्यवस्था की कमियों को पूरा कर सकें। कम से कम 4 साल के कार्यकाल की वकालत करते हुए उन्होंने स्थायी समिति के सदस्यों से कहा कि अमेरिका में भी सेंट्रल बैंक के गवर्नर को 4 साल का ही कार्यकाल मिलता है।

राजन के इन विचारों के पीछे उनके कुछ अहम प्रयास हैं जो शायद उनकी गैर-मौजूदगी में वैसे पूरे न हो पाएं जैसा की वे चाहते थे। इनमें खास हैं बैंकों को अपने NPAs यानी के अपने Non Performing Assests को घाटे के तौर पर दिखाने के लिए उन्हें मजबूर करना। अब तक होता यही रहा था कि बैंक अपनी डूबी पुंजियों को छुपाते रहे थे, जिसका नतीजा रहे हैं विजय माल्या एपीसोड जैसी कई घटनाएं।

4 साल के कार्यकाल की वकालत के पीछे शायद राजन की वो सोच है, जिसमें बैंक अपने पुराने ढर्रे पर लौट सकते हैं। स्थाई समिति के सामने उन्होंने फिर से ब्याज दर नहीं घटाने की बात की और कहा कि बैंकों के पास बहुत पैसा है। ब्याज दर घटाने से ज्यादा जरूरी बैंकों को बाजार में पैसे छोड़ने के लिए तैयार करना है।

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