राजस्थान के शूरवीरों ने जर्मन सेना से 1 घंटे में ही जीता था हैफा शहर

 नई दिल्ली(6 जुलाई): प्रधानमंत्री आज इज़राइल के हैफा शहर गए हैं। यह शहर भले ही कोसो दूर हो लेकिन इस जमीं पर राजस्थान के शूरवीरों ने जबरदस्त वीरता दिखाते हुए 1918 में लडे गए प्रथम विश्व युद्द में जर्मन सेना से लोहा लेते हुए महज एक घंटे में ही हैफा शहर पर कब्जा कर लिया था। ये सभी सैनिक मारवाड़ के घुड़सवार सैनिक थे जिन्हें 70 साल के इतिहास में पहली बार इजराइल यात्रा पर गए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इसी हैफा शहर में शहीदों को नमन करने के लिए गुरुवार को जा रहे हैं।

- मारवाड़ के वीर सपूत जोधपुर लांसर के मेजर दलपतसिंह शेखावत और कैप्टन अमानसिंह जोधा की अगुवाई में जोधपुर और मैसूर की टुकड़ी ने जर्मन सेना की तोपों मशीनगनों का मुकाबला किया था।  

- भारतीय शूरवीरों ने जर्मन-तुर्की सेना के 700 सैनिकों को युद्धबंदी बना लिया। इसमें 23 तुर्की तथा 2 जर्मन अफसरों ने भी हथियार डाल दिए। भारतीय शूरवीरों ने जर्मन-तुर्की सेना की 17 तोपें, 11 मशीनगन हजारों की संख्या में जिंदा कारतूस भी जब्त कर लिए।

-  हैफा शहर का यह हमला विश्व में घुड़सवार हमले का सबसे महत्वपूर्ण युद्ध माना गया। 23 सितंबर 1918 के दिन हुए इस युद्ध में मेजर दलपतसिंह समेत सात हिंदुस्तानी शहीद हुए थे। हैफा युद्ध में शहीदों की याद में दिल्ली स्थित तीन मूर्ति स्मारक पर एक मूर्ति ठाकुर दलपतसिंह की भी है।

- इजरायल ने भारतीय शूरवीरों की हैफा शहर पर फतेह की शौर्यगाथा को अपने देश के स्कूली पाठयक्रम में शामिल किया है। लेकिन राजस्थान में इन वीर शहीदों का कोई उल्लेख तक पाठयक्रम में नहीं है। प्रथम विश्व युद्ध ब्रिटिश जर्मन सेना के बीच लड़ा गया था, जिसमें गठबंधन देशों ने हिस्सा लिया था।

-  जर्मनी तुर्की की गठबंधन सेना ने इजरायल के येरुशलम शहर के उतर में समुद्र तट के निकट प्रमुख बंदरगाह वाले हैफा शहर के दुर्ग पर कब्जा कर लिया था। जहां दुर्ग के ऊपर से जर्मन तुर्की सैनिक तोपों मशीनगनों से इजरायल सेना पर हमला कर रहे थे। प्रथम विश्वयुद्ध में ब्रिटिश सेना के अगुवाई में शामिल हुई भारतीय सेना ने हैफा शहर को जर्मन सेना से मुक्त कराने जिम्मेदारी जोधपुर लांसर और मैसूर लांसर के जवानों को दी गई थी।

- ब्रिटिश सेना को जोधपुर-मैसूर लांसर के घुड़सवारों पर पूरा भरोसा था। जोधपुर लांसर के मेजर ठाकुर दलपतसिंह शेखावत अपनी टुकड़ी को लेकर युद्ध करने के लिए निकल पड़े। युद्ध में जर्मन सेना लगातार घुड़सवारों को खदेडऩे के लिए बंकरों से तोप मशीनगनों से लगातार गोले दागती रही।

- इस दौरान मेजर दलपतसिंह सहित 6 घुड़सवार शहीद हो गए जबकि 60 से ज्यादा घोड़े भी युद्द में मारे गए। इसके बाद जोधपुर लांसर के कैप्टन अमानसिंह जोधा ने अपने घुड़सवारों के साथ जर्मन सेना का मुकाबला किया तथा एक घंटे में ही हैफा शहर को अपने कब्जे में ले लिया। जोधपुर लांसर के वीर सैनिक घुड़सवार सोवर तगतसिंह, सोवर शहजादसिंह, मेजर शेरसिंह आईओएम, दफादार धोकलसिंह, सोवर गोपालसिंह और सोवर सुल्तानसिंह भी इस युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए।

   

- इस ऐतिहासिक पल को यादगार बनाने के लिए सरकार ने नई दिल्ली के त्रिमूर्ति स्मारक का निर्माण कराया। यहां पर ठाकुर दलपतसिंह की प्रतिमा भी स्थापित है। इसके साथ ही भारत सरकार ने हिमाचल प्रदेश के शिमला में 26 अप्रैल 1919 में इन शूरवीरों के नाम मेरिट अवार्ड जारी किया था। 1919 में जारी किए गए इस मेरिट अवार्ड पर भारत सरकार के जनरल सेक्रेट्री ए.एच बिंगले के हस्ताक्षर है। इनमें मेजर दलपतसिंह को मिलिट्री क्रॉस से अलंकृत किया गया था, वहीं कैप्टन अमानसिंह जोधा को सरदार बहादुर की उपाधि देते हुए उनको आईओएम (इंडियन आर्डर ऑफ मेरिट) तथा ओ.बी.ई (ऑर्डर ऑफ ब्रिटिश इंपायर) से सम्मानित किया गया।