भाई उद्धव पर आग बबूला राज ठाकरे

मुंबई (15 अक्टूबर): शिवसेना ने महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना को पिछले दिनों बड़ा झटका दिया। एमएनएस के 7 में 6 पार्षद पार्टी छोड़कर शिवसेना में शामिल हो गए। पार्टी में इस टूट के लिए एमएनएस प्रमुख राज ठाकरे शिवसेना प्रमुख को जिम्मेदार ठहरा रहे है। राज ठाकरे में अपने पार्षदों के शिवसेना में शामिल होने पर उद्धव ठाकरे पर बड़ा हमला किया है। राज ठाकरे का कहना है कि शिवसेना ने पैसे के बल पर उसके पार्षदों को खरीदा है और वो इसके लिए शिवसेना और उद्धव ठाकरे को कभी माफ नहीं करेंगे। साथ ही उन्होंने कहा कि जल्द ही इसका खामयाजा शिवसेना और उद्धव ठाकरे को उठाना पड़ेगा।

आपको बता दें कि मुंबई महानगरपालिका पर 20 साल से शिवसेना का कब्जा है। अब तक बीएमसी में बीजेपी उसके आसपास भी नहीं फटक पाती थी। लेकिन इसी साल फरवरी में हुए बीएमसी चुनाव में बीजेपी ने शिवसेना को कड़ी टक्कर दी। शिवसेना को 84 सीटें मिलीं तो बीजेपी भी 82 सीटों के साथ ज्यादा पीछे नहीं रही। बीएमसी में बहुमत का आंकड़ा 114 सीटों का है। बीजेपी द्वारा महापौर की दावेवारी से पीछे हट जाने के कारण शिवसेना ने चार निर्दलीय सभासदों को साथ लेकर सत्ता हासिल कर ली। लेकिन भांडुप उपचुनाव में बीजेपी की जीत के बाद शिवसेना को अपनी सत्ता पर खतरा मंडराता दिख रहा है। उसे लग रहा है कि बीजेपी कांग्रेस-एनसीपी सहित कुछ छोटे दलों के सभासदों को अपनी ओर खींचकर बीएमसी की सत्ता उससे छीन सकती है।

मनपा में इस समय कांग्रेस के 30 एवं राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के नौ सभासद हैं। पांच निर्दलियों में से चार शिवसेना के साथ हैं, एक भाजपा के साथ। कांग्रेस के पूर्व विधायक राजहंस सिंह अब कांग्रेस छोड़ बीजेपी में आ चुके हैं। वह लंबे समय तक मनपा में कांग्रेस की तरफ से विरोधी दल के नेता रहे हैं। उनके संपर्क में कांग्रेस के कई सभासद हैं। नारायण राणे के समर्थक भी कई कांग्रेसी सभासद हैं। शिवसेना को आशंका है कि बीजेपी राजहंस और नारायण राणे की मदद से या तो कांग्रेस के दो तिहाई सभासदों को तोड़कर या कांग्रेस सभासदों से बड़े पैमाने पर इस्तीफा दिलवाकर उपचुनाव में उन्हें अपने टिकट पर चुनवाकर अपनी संख्या बढ़ा सकती है।

बीएमसी में एक बार चुने गए महापौर का ढाई साल का कार्यकाल होता है और उसे पूरा हुए बिना हटाया नहीं जा सकता। लेकिन संख्या बल पर्याप्त हो तो बीएमसी के कामकाज में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभानेवाली स्थायी समितियों पर कब्जा किया जा सकता है। फिलहाल ये समितियां शिवसेना के कब्जे में हैं। बीजेपी सदन में अपनी संख्या बढ़ाकर इन पर कब्जा करना चाहती है।