92 साल की परंपरा टूटेगी, 2017 से नहीं पेश होगा रेल बजट

कुन्दन सिंह, नई दिल्ली (20 सितंबर): सन 1924 से अब तक बीते 92 साल से चली आ रही आम बजट से अलग अपनी पहचान बना चुकीं रेल बजट की परंपरा अब खत्म हो जाएगी। सूत्रों की माने तो बुधवार को होने वाली कैबिनेट में रेल बजट का आम बजट में विलय करने का प्रस्ताव पेश होगा, जिसके बाद ये रेल बजट की परंपरा इतिहास के पन्नों में कही समा जाएगी। यानी आने वाले साल 2017 नें अब बजट पेश होगा वो आम बजट होगा। जिसमें रेल बजट उसी का हिस्सा होगा, जैसे बाकि के मंत्रालय के लिए होता है।

इन दोनों बजट में विलय के दोनों मंत्रालयों के अधिकारों का बटंवारा बाकी है, ये प्रकिया बाद में तय होगी। वित्त मंत्रालय और रेल मंत्रालय के बीच जिन विषयों पर अभी अतिम निर्णय होना बाकी है, उनमें पेंशन की देनदारी, डीबीडेंट, रेलवे को वित्त मंत्रालय से मिलने वाला ग्रोस बजटरी सपोर्ट, टैरिफ तय करने का अधिकार जैसे मुददों शामिल है। रेल मंत्रालय की मांग है कि किराया, माल भाड़े में संशोधन और बाजार से उधारी लेने जैसे मामलो का अधिकार उसी के पास रहे। जिससे उनके अपने ऑपरेशनल साथ ही बाजार में बढ़ते कम्पटीशन के दौर पर बने रहने के लिए निर्णय जल्दबाजी में लिया जा सके।

रेलवे की चिंता है कि मौजूदा समय में सातवें वेतन आयोग का बोझ, साथ में माल भाड़े की ढ़ुलाई में हो रही लागातर कमी की वजह से पहले से ही आर्थिक बोझ झेल रहे मंत्रालय के लिए डिविडेंट देने के से लेकर अपनी खुद की ऑपरेशनल खर्चे चालाने में मुशकिल हो रही है। वैसे में अगर बजट में विलय में और अधिकारों में कटौती हुई तो इनके लिए मुश्किल खड़ी हो सकती है।

इस साल के रेलवे के बजट प्लान की बात करें तो 2016 -17 के दौरान...- रेलवे को सैलरी के लिए करीब 70 हजार करोड़ रुपये चाहिए।- वहीं फ्यूल के लिए 23 हजार करोड़- पेंशन के लिए 45 हजार करोड़- साथ में डीवीडेंट के लिए 55 सौ करोड़

वहीं रेल मंत्रालय को उम्मींद है कि बजट के विलय हो जाने के रेलवे को वित्तीय तौर पर आजादी मिल सकेगी। साथ में डिविडेंट के नाम पर करीब 5 से 6 हजार करोड़ रुपये का बोझ नहीं होग। वित्त मंत्रालय के आगे ग्रास बजटरी सपोर्ट के लिए दरवाजा नहीं खटखटाना पड़ेगा। साथ में सातवे वेतन आयेग का बोझ उठाने में मंत्रालय सहयोग करेगा। जहं तक किराया बढ़ाने के अधिकार की बात है, उसपर दोनों मंत्रालयों के बीच इस बात की सहमति है कि आगे किराये में संशोधन रेल टैरिफ अथॉरिटी के पास हो। इसके साथ ही रेलवे को नई परियोजाओं, रेलगाडिय़ों और विस्तार योजनाओं की घोषणा करने की पूरी छुट होगी।