राफेल विवाद: डसॉल्ट के CEO बोले- हमने अंबानी को खुद चुना

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न्यूज 24 ब्यूरो, नई दिल्ली (13 नवंबर): देश में राफेल डील को लेकर सत्तारुढ़ पार्टी और विपक्षी दल के बीच में चल रहे आरोप प्रत्यारोप के बीच डसॉल्ट के सीईओ एरिक ट्रैपियर ने न्यूज एजेंसी एएनआई को दिए इंटरव्यू में बताया है कि वह भारत के साथ काम कर रहे हैं, किसी एक पार्टी के लिए नहीं।इतना ही नहीं उन्होंने ये भी कहा कि हमारा कांग्रेस पार्टी के साथ लंबा अनुभव है। हमारी पहली डील साल 1953 में नेहरू के साथ हुई थी। हम भारतीय वायुसेना और भारत सरकार को फाइटर्स जैसे प्रोडक्ट्स की आपूर्ति कर रहे हैं।एनआई को दिए गए इंटरव्यू में उन्होंने कहा कि हमने खुद अंबानी को चुना। हमारे रिलायंस के अलावा 30 अन्य पार्टनर्स भी हैं। इस सौदे का भारतीय वायुसेना इसलिए समर्थन कर रही है क्योंकि उन्हें खुद की रक्षा के लिए फाइटर्स जेट्स की आवश्यकता है। वहीं, कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के आरोपों पर एरिक ने कहा कि मैं झूठ नहीं बोलता हूं। जो सच मैंने पहले बोला है और जो बयान दिए हैं, वो पूरी तरह से सही हैं। आप भी मेरी जगह पर होते तो झूठ नहीं बोलते।बता दें कि राफेल के कीमत को लेकर सीईओ ने कहा कि वर्तमान विमान 9% सस्ते हैं। 36 विमानों की कीमत उतनी ही है जितनी 18 विमानों की थी। 18 से 36 दोगुना है। ऐसे में यह कीमत दोगुनी हो जानी चाहिए थी। लेकिन यह सरकार से सरकार के बीच का सौदा है तो हमें 9 फीसदी तक कीमतें कम करनी पड़ी।

इतना ही नहीं एरिक ने दिए गए इंटरव्यू में ये भी बताया कि पहले टाटा और अन्य कंपनियों से भी टाईअप के लिए बातचीत हुई थी। साल 2011 में टाटा भी कई अन्य विमान कंपनियों से बातचीत में थी। लेकिन आखिरकार रिलायंस की इंजीनियरिंग सुविधाएं को देखते हुए हम उनके साथ गए। वहीं, राफेल विमान के बारे में डसॉल्ट के सीईओ ने कहा कि वर्तमान विमानों में सभी जरूरी चीजें मौजूद हैं बस हथियारों और मिसाइलों को छोड़कर। एक दूसरे कॉन्ट्रैक्ट में हथियार दिए जाएंगे। लेकिन हथियारों के बिना सभी चीजों से लैस राफेल विमान डसॉल्ट देगा।आपको बता दें कि इससे पहले सोमवार को सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के मुताबिक 36 राफेल विमानों की खरीद के संबंध में किये गए फैसले के ब्योरे वाले दस्तावेज याचिकाकर्ताओं को सौंप दिए। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक दस्तावेजों के अनुसार राफेल विमानों की खरीद में रक्षा खरीद प्रक्रिया-2013 में निर्धारित प्रक्रिया का पालन किया गया है।विमान के लिये रक्षा खरीद परिषद की मंजूरी ली गई  और भारतीय दल ने फ्रांसीसी पक्ष के साथ बातचीत की। दस्तावेजों में कहा गया है कि फ्रांसीसी पक्ष के साथ बातचीत तकरीबन एक साल चली और समझौते पर हस्ताक्षर करने से पहले मंत्रिमंडल की सुरक्षा मामलों की समिति की मंजूरी ली गई।