मिलिए इतिहास रचने वाली पीवी सिंधु के 'द्रोणाचार्य' से

नई दिल्ली (19 अगस्त) : आज चारों ओर इतिहास रचने वाली बैडमिंटन खिलाड़ी पीवी सिंधु के बारे में बातें हो रही हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि सिंधु की इस कामयाबी के पीछे किसका हाथ है। सिंधु को किसने इस मुकाम तक पहुंचाया। हर अर्जुन के पीछे एक द्रोणाचार्य होता है और सिंधु की कड़ी मेहनत और सफलता के पीछे जिस द्रोणाचार्य का हाथ है वो हैं 'पुल्लेला गोपीचंद'। बैडमिंटन के लिहाज से पिछले दो ओलंपिक भारत के लिए बेहद खास रहे हैं। 2012 के लंदन ओलंपिक में साइना ने बैडमिंटन में भारत को पहला मेडल दिलाया। 2016 रियो ओलंपिक में इस सफलता को आगे बढ़ाते हुए सिंधु ने फाइनल में पहुंच कर सिल्वर मेडल पक्का कर लिया है। इन दोनों शीर्ष महिला खिलाड़ी के अलावा पी कश्यप और श्रीकांत नें भी अपने प्रदर्शन से सबको प्रभावित किया है।

बैडमिंटन में भारत के बढ़ते रुतबे के पीछे एक नाम काम कर रहा है। वो नाम है इन सभी खिलाड़ियों के कोच पुलेला गोपीचंद का। गोपीचंद भारतीय बैडमिंटन के द्रोणाचार्य बन चुके हैं। भारतीय बैडमिंटन दल के राष्ट्रीय कोच गोपीचंद हैदराबाद में बैडमिंटन एकेडमी चलाते हैं। इसी एकेडमी से प्रशिक्षित होकर बैडमिंटन खिलाड़ी अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत का गौरव बढ़ा रहे है। गुरुवार को जब सिंधू सेमीफाइनल जीतने के बाद ट्विटर पर ट्रैंड कर रही थी तब गोपीचंद के नाम पर भी कई लोग ट्वीट कर रहे थे।

आइए विस्तार से जानते हैं बैडमिंटन के इस द्रोणाचार्य के बारे में...

- पुल्लेला गोपीचंद का जन्म 16 नवम्बर 1973 को आंध्र प्रदेश के प्रकाशम जिले के नगन्दला में हुआ था। - गोपीचंद खुद इंडिया के एक शानदार बैडमिंटन खिलाड़ी रहे हैं।  - मात्र 10 साल की उम्र से गोपीचंद ने बैडमिंटन खेलना शुरू किया था। - गोपीचंद के खेल से प्रभावित होकर स्टार बैडमिंटन खिलाड़ी प्रकाश पादुकोण ने अपनी अकादमी में शामिल कर लिया था।  - गोपीचंद 2001 में चीन के चेन होंग को फाइनल में 15-12,15-6 से हराते हुए ऑल इंग्लैंड ओपन बैडमिंटन चैंपियनशिप जीता। - प्रकाश पादुकोण के बाद ऑल इंग्लैंड ओपन बैडमिंटन चैंपियनशिप जीतने वाले वो दूसरे भारतीय हैं। - प्रकाश पादुकोण ने 1980 में ऑल इंग्लैंड ओपन बैडमिंटन चैंपियनशिप में जीत हासिल की थी। - गोपीचंद साल 2001 के लिए राजीव गांधी खेल रत्न पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। - लेकिन चोटों के कारण उनके खेल पर प्रभाव पड़ा और वर्ष 2003 में उनकी रैंकिंग गिर कर 126 पर आ गयी  - जिसके बाद गोपीचंद ने राष्ट्रीय स्तर पर खेलना बंद कर दिया। - किसी प्रोडक्ट का प्रचार करने का हिस्सा बनने के बजाय गोपीचंद ने अपनी अकडेमी खोली। - देश को सायना नेहवाल, श्रीकांत, सिंधु और पी कश्यप जैसे नायाब हीरे दिये। - गोपीचंद को 2005 में पद्म श्री और 2014 में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया। - उनकी गिनती इंडिया के बेस्ट बैडमिंटन कोच में होती है।  - गोपीचंद को 2009 में द्रोणाचार्य पुरस्कार से भी सम्मानित किया जा चुका है। - गोपीचंद ने 5 जून 2002 को अपनी साथी ओलंपियन बैडमिंटन खिलाड़ी पीवीवी लक्ष्मी से शादी की थी। - पीवीवी लक्ष्मी भी बैडमिंटन खिलाड़ी रह चुकी हैं। - पुलेला गोपीचंद की बेटी गायत्री भी एक बेहतरीन उभरती हुई बैडमिंटन खिलाड़ी हैं। - गायत्री को भविष्य की स्टार शटलर माना जा रहा है।  - वह 2015 में इंडोनेशिया में हुई एशियाई यूथ चैंपियनशिप में भारत की अंडर-15 और अंडर-17 टीम का हिस्सा थीं। - अंडर-13, अंडर-15 बालिका खिताब के साथ-साथ अंडर-15 का युगल खिताब भी अपने नाम कर चुकी हैं।  - अंडर-13 राष्ट्रीय बैडमिंटन चैम्पियनशिप का खिताब भी अपने नाम कर चुकी हैं गायत्री। - गोपीचंद की मां सुब्बरावांमा बोस कहती हैं कि बेटे- बहू से लेकर दोनों पोता-पोती बैडमिंटन खेलते हैं।  - रोजाना सुबह चार बजे से देर रात तक घर में सिर्फ बैडमिंटन की ही बात चलती रहती हैं। 

गहने बेचकर खरीदा था बैडमिंटन रैकेट - गोपीचंद को एक अच्छा खिलाड़ी बनने के लिए भी काफी संघर्ष करना पड़ा था। - बैडमिंटन रैकेट खरीदने के लिए उनके पास पैसे नहीं हुआ करते थे। - उनको अपना पहला बैडमिंटन रैकेट खरीदने के लिए अपने घर के गहने बेचने पड़े थे। - बार-बार घायल होने की वजह से भी गोपीचंद के अच्छा बैडमिंटन खिलाड़ी बनने का सपना कई बार टूटा। - लेकिन गोपीचंद ने अपने ज़िंदगी में कभी हार नहीं मानी। - मेहनत और निष्ठा से हर समस्या को दरकिनार करते हुए आगे बढ़ा।