देश के मौजूदा हालात पर पूर्व राष्ट्रपति ने जताई चिंता, कही ये बातें


न्यूज 24 ब्यूरो, नई दिल्ली (24 नवंबर ): देश के पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने देश के मौजूदा हालात पर चिंता जताई है। शुक्रवार को दिल्ली में ‘शांति, सौहार्द्र एवं प्रसन्नता की ओर : संक्रमण से बदलाव' विषय पर आयोजित राष्ट्रीय सम्मेलन के उद्घाटन के मौके पर पूर्व राष्ट्रपति ने संस्थानों और राज्य के बीच शक्ति के उचित संतुलन की आवश्यकता पर जोर दिया।  प्रणब  मुखर्जी ने कहा कि संस्थानों की विश्वसनीयता बहाली के लिए सुधार संस्थानों के भीतर से होने चाहिए। शासन और संस्थानों के कामकाज को लेकर मोहभंग की स्थिति की ओर ध्यान दिलाते हुए पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने कहा कि संस्थान राष्ट्रीय चरित्र का आईना हैं तथा भारत के लोकतंत्र को बचाने के लिए उन्हें लोगों का विश्वास दोबारा जीतना चाहिए।

पूर्व राष्ट्रपति मुखर्जी ने कहा कि ‘हमारे संविधान ने विभिन्न संस्थानों और राज्य के बीच शक्ति का एक उचित संतुलन प्रदान किया है। यह संतुलन बनाए रखा जाना चाहिए।' साथ ही उन्होंने कहा कि पिछले 70 सालों में देश ने एक सफल संसदीय लोकतंत्र, एक स्वतंत्र न्यायपालिका और निर्वाचन आयोग, नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक, केंद्रीय सतर्कता आयोग तथा केंद्रीय सूचना आयोग जैसे मजबूत संस्थान स्थापित किए हैं जो हमारे लोकतांत्रिक ढांचे को जीवंत रखते हैं और उन्हें संबल देते हैं। उन्होंने कहा कि देश को एक ऐसी संसद की जरूरत है जो बहस करे, चर्चा करे और फैसले करे, न कि व्यवधान डाले। एक ऐसी न्यायपालिका की जरूरत है जो बिना विलंब के न्याय प्रदान करे। एक ऐसे नेतृत्व की जरूरत है जो राष्ट्र के प्रति समर्पित हो और उन मूल्यों की जरूरत है जो हमें एक महान सभ्यता बनाएं।

लगे हाथों पूर्व राष्ट्रपति ने कहा कि हमें एक ऐसे राज्य की आवश्यकता है जो लोगों में विश्वास भरे और जो हमारे समक्ष उत्पन्न चुनौतियों से निपटने की क्षमता रखता हो। साथ ही उन्होंने कहा कि, ‘हालिया विगत में ये संस्थान गंभीर दबाव में रहे हैं और उनकी विश्वसनीयता पर सवाल उठ रहे हैं। शासन और संस्थानों की कार्यप्रणाली को लेकर व्यापक तौर पर उदासीपन तथा मोहभंग की स्थिति है। इस विश्वसनीयता को बहाल करने के लिए सुधार संस्थानों के भीतर से होने चाहिए।'

प्रणब मुखर्जी ने कहा कि ‘उन्होंने कहा कि देश अब कठिन दौर से गुजर रहा है। जिस धरती ने दुनिया को वसुधैव कुटुंबकम और सहिष्णुता, स्वीकार्यता और क्षमा के सभ्यतागत मूल्यों की अवधारणा दी, वह अब बढ़ती असहिष्णुता, रोष की अभिव्यक्ति और मानवाधिकारों के उल्लंघन को लेकर खबरों में है। 'पूर्व केंद्रीय मंत्री एवं भाजपा सांसद मुरली मनोहर जोशी ने भी इस अवसर पर संबोधन किया और शांतिपूर्ण, सौहार्द्रपूर्ण तथा सुखद समाज बनाने की दिशा में काम किए जाने पर जोर दिया।


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