ईसाइयत में जो पिछले 1000 साल में नहीं हुआ वो 12 फरवरी को होगा

नई दिल्ली (11 फरवरी) :  पोप फ्रांसिस शुक्रवार को ऐतिहासिक पहल करने जा रहे हैं। वे क्यूबा में  रशियन ऑर्थोडॉक्स चर्च के प्रमुख पैट्रियाक किरिल से मिलने वाले हैं। यह मुलाकात रोमन कैथलिक चर्च और रशियन ऑर्थोडॉक्स चर्च के बीच पिछले 1000 वर्षों से बनी दूरी को पाटने के लिहाज से बेहद अहम है। इस मुलाकात का तात्कालिक उद्देश्य इस्लामी आतंकवाद से मिल रही चुनौती को रेखांकित करना है।

ईसाई धर्म की ये पूर्वी और पश्चिमी शाखाएं सन 1054 में, यानी पहले क्रूसेड से थोड़ा ही पहले एक-दूसरे से अलग हुई थीं। पूर्वी ऑर्थोडॉक्स चर्च में रूसी प्रभाव इस रूप में समझा जा सकता है कि विश्व के 25 करोड़ ऑर्थोडॉक्स ईसाइयों में से करीब साढ़े सोलह करोड़ रूसी चर्चों के प्रभाव में हैं। स्वाभाविक है कि दोनों धर्मगुरुओं की इस मुलाकात को उम्मीद भरी नजरों से देखा जा रहा है।

क्यूबा में मुलाकात के बाद दोनों धर्मगुरु मध्य पूर्व में ईसाइयों के साथ ज्यादती रोकने की अपील भी करेंगे। लेकिन यह बात ध्यान देने की है कि भले ही इस्लामी आतंकवाद के खतरे ने दोनों धर्मगुरुओं की मुलाकात को संभव बनाने में अहम भूमिका निभाई हो, पर इस एकता प्रयास का कोई कम्युनल अजेंडा नहीं है। पोप फ्रांसिस ने अपने अभी तक के कामों और बयानों के जरिये यह साबित किया है कि धर्म के मामले में उनका कोई दकियानूसी नहीं बल्कि खुला नजरिया है। वह इस्लाम समेत सभी धर्मों के साथ संवाद कायम करने के पक्ष में रहे हैं और कभी किसी अन्य धर्म को नेगेटिव ढंग से देखने या दिखाने का प्रयास नहीं किया है।

पोप फ्रांसिस इकलौते धर्मगुरु होंगे, जिसने नास्तिकों के लिए भी सम्मानपूर्ण स्थान की गुंजाइश बनाते हुए कुछ समय पहले कहा था कि 'ये लोग खुद को किसी धर्म का अनुयायी नहीं मानते, लेकिन सच्चाई, अच्छाई और सुंदरता की तलाश ये भी करते हैं। इंसान की गरिमा सुनिश्चित करने के सफर में ये हमारे बहुमूल्य सहयोगी हैं।'

फादर सवरीमुत्तू शंकर, प्रवक्ता, दिल्ली कैथोलिक चर्चेस ने कहा कि हम बहुत खुश हैं कि पोप फ्रांसिस और रशियन ऑर्थोडॉक्स चर्च के प्रमुख पैट्रियाक किरिल की मुलाकात होने जा रही है। हमें उम्मीद है और प्रार्थना करते हैं कि इस बैठक से चर्चों के बीच एकता का मार्ग प्रशस्त हो।