सियासी दलों को छूट पर जेटली बोले - सरकार ने नहीं लिया कोई नया फैसला

नई दिल्ली (17 दिसंबर): देश भर में एक सवाल पर जबर्दस्त बहस हुई। सवाल था कि जब आम लोगों पर नोटबंदी के बाद कई तरह की पाबंदियां लगाई गई हैं तो फिर सियासी दलों को इससे छूट क्यों दी गई? मुद्दा राजनीतिक दलों की तरफ से कैश में लिए गए चंदे का कोई हिसाब नहीं देने का है। सियासी दलों को इस बात की छूट है कि वे जितने चाहें, उतने 500 और हजार के पुराने नोट खाते में जमा कराएं। उनसे आयकर विभाग चंदे की रकम का स्रोत नहीं पूछेगा।

ताजा फैसले के मुताबिक, राजनीतिक दलों को 500 और हजार रुपए के पुराने नोटों में लिए गए चंदे का कोई हिसाब नहीं देना होगा। नोटबंदी के बाद सियासी दलों ने अपने खाते में 500 और हजार के जितने भी नोट जमा कराए हैं, अब उसकी कोई जांच नहीं होगी। शर्त बस इतनी है कि ये नोट राजनीतिक दलों के खातों में जमा कराए गए हों।

राजनीतिक दलों को ये छूट इनकम टैक्स एक्ट 1961 के सेक्शन 13 ए के तहत दी गई है। इसके मुताबिक राजनीतिक दलों की मकान और संपत्ति या चंदे से हुई कमाई पर टैक्स नहीं लगाया जाता। राजनीतिक दलों को चंदे में मिली रकम पर इनकम टैक्स से छूट उस स्थिति में दी जाती है, जब उसने 20,000 रुपये तक का चंदा कैश में लिया हो।

सरकार आयकर कानून का हवाला देकर इस मामले में पल्ला झाड़ रही है, वो कह रही है कि हमने अपनी तरफ से सियासी दलों को छूट देने का कोई फैसला नहीं किया है। इस बारे में वित्त मंत्रालय की तरफ से बड़ी सफाई आई। वित्त मंत्रालय ने कहा कि रजिस्टर्ड राजनीतिक दलों को कानून के मुताबिक आयकर में छूट पहले से मिल रही है। कोई नया फैसला नहीं किया गया है। तय सीमा यानी 20 हजार रुपए से ऊपर के तमाम चंदों का पूरा हिसाब-किताब रखने की बात पहले से तय है।

हर राजनीतिक दल के खाते का ऑडिट एक चार्टर्ड अकाउंटेंट से कराना होता है। तय समय सीमा में हर दल को अपने चंदे का ब्यौरा चुनाव आयोग को देना होता है। राजनीतिक दल के खातों की जांच के लिए इनकम टैक्स एक्ट में कई प्रावधान हैं, जिसके तहत आईटी रिटर्न दाखिल करने के बाद भी इसकी जांच होती है।