बाबा बंदा सिंह की 300वें शहीदी दिवस पर बोले PM, 'सिख इतिहास के हर पन्ने पर शहीदों की दास्तान-ए-दर्द'

नई दिल्ली (3 जुलाई): प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बाबा बंदा सिंह बहादुर की 300वें शहीदी दिवस के मौके पर नई दिल्ली में आयोजित एक कार्यक्रम में संबोधित किया। भाषण की शुरुआत में उन्होंने पंजाबी में बोलकर बाबा बंदा सिंह बहादुर को श्रृद्धांजलि दी। 

ये कार्यक्रम गुरुद्वारा प्रबंध कमेटी की तरफ से किया गया। पीएम मोदी ने कार्यक्रम में घोषणा की कि इस साल भारत सरकार गुरु गोविंद सिंह के जन्म की 350वीं जयंती सम्मान के साथ मनाने जा रही है। देश ही नहीं दुनिया भर में भारतीयों के इस आयोजन को मनाने के लिए करोड़ो रुपए की राशि आवंटित करने का एलान किया। 

इस मौके पर केंद्रीय मंत्री हरसिमरत कौर, रविशंकर प्रसाद, राज्यवर्धन सिंह राठौर और पंजाब के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल मौजूद रहे। पंजाब चुनाव के मद्देनज़र इस कार्यक्रम को काफी अहम माना जा रहा है। 

पीएम मोदी ने के भाषण के खास बिंदु-

बाबा बंदा सिंह बहादुर को नतमस्तक होकर नमन।

बाबा बंदा सिंह बहादुर ने समाज के लिए मर मिटने की कामना के साथ समाजसुधार जैसी मजबूत नींव रखी।

उनकी सीख को कार्यकलाप में लाने के लिए उनका पुण्य स्मरण कर रहे हैं।

बाबा बंदा सिंह पंजाब या उत्तर भारत तक सीमित नहीं, उनका जीवन एक आदर्श है, जो 300 सालों से भारत को प्रेरणा देता रहा है।

सामान्य मानव के प्रति अत्यंत संवेदनशील प्रशासक के रूप में वह अंकित करके गए हैं।

गुरुदेव टैगोर ने उनके मानवीय गुण लोगों के सामने प्रस्तुत किए, जो दूसरों के लिए मिसाल होते हैं।

युद्ध के दौरान बंदा सिंह बहादुर को कभी भी एक पल भी एक डगर भी अपने मार्ग से विचलित होने की घटना इतिहास में कभी नज़र नहीं आता।

वो तलवार की धार पर जीवन जीते रहे।

जीवन के शासकीय काल में मार्ग से कभी विचलित ना होने जैसे शक्तियां इतिहास में बेहद कम नज़र आती हैं।

बाबा बंदा सिंह गुरुदेव रविन्द्र नाथ टैगोर के लिए प्रेरणा बने।

बाबा बंदा सिंह बहादुर जीने जो कविता लिखी है, उस कविता से हमें जीवन जीने की प्रेरणा मिलती है।

बाबा बहादुर का जन्म जब हुआ तो सामाजिक उथल पुथल थी। उनका बचपन इनके असर ने अछूता नहीं रहा। वो आपस के माहौल को समझते रहे।

इंसान की जिंदगी में कभी-कभी एक घटना आगे का सफर तय करती है।

किशोरावस्था में एक जानवर को मारने के बाद उन्हें इतनी ग्लानि हुई, कि वो वैरागी हो गए।

बाबा बहादुर की जिंदगी में एक घटना उन्हें आंदोलित कर गई। ये वैराग्य उन्हें गुरु गोविंद सिंह के चरणों में ले गया।

उन्होंने अपने पुराने नाम को छोड़कर गुरु गोविंद सिंह की प्रेरणा से आगे बढ़े।

उन्होंने गुरु गोविंद के विचारों को मन में बिठा लिया। उन्होंने गुरु शिष्य परंपरा की मिसाल पेश की।

गुरु गोविंद सिंह के इस बंदे ने लोगों को जोड़कर महान सैन्य शक्ति का निर्माण किया, संगठन कौशल का परिचय दिया।

हौसला बुलंद था, जीवन भर के लिए वह अपने जीवन को आहूत करने के लिए हर वक्त तैयार रहते थे।

बंदा सिंह बहादुर ने किसानों के अधिकारों के लिए नई दिशा दी।

वो जानते थे कि समाज की तरक्की तब होगी, जब समाज के हर तबके का विकास होगा

वो खुद को शासन का सिर्फ एक साझीदार मानते थे, यहां तक कि सिक्के और मोहर भी गुरुनानक जी, और गुरु गोविंद सिंह के नाम से चलवाए।

आज के युग की राजनीति देखें, तो वो तो तलवार की नोंक पर... जीवन को आहूत कर शासन अर्जित किया लेकिन उन्होंने कभी भी इसे अपने लिए उपयोग नहीं किया।

वह सांस्कृतिक इतिहास को महत्व देते थे।

सिख इतिहास के हर पन्ने पर शहीदों की दास्तान-ए-दर्द है, लेकिन बाबा सिंह बहादुर शायद ही कोई और उदाहरण हमें मिल सकता है, जो कभी बैरागी थे कि उन्हें राष्ट्रभक्ति से इतना हौसला दे दिया, कि वो कभी ना यातनाओं से डरे ना मौत से डरे।