जानिए, मोदी के 'ईरानी' दांव से क्यों फूल गईं हैं पाकिस्तान की सांसें...

शैलेश कुमार, नई दिल्ली (23 मई): प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ईरान दौरे पर हैं। हिंदुस्तान ने तेहरान में एक ऐसा दांव चला है, जिसके बाद अब न तो चीन की चालबाजी चलेगी और न ही पाकिस्तान का पैतरा। भारत-ईरान के बीच चाबहार पोर्ट को लेकर एक बड़ा समझौता हुआ है। चाबहार पोर्ट भारत के लिए सामरिक रुप से बहुत अहम है। इस समुद्री रास्ते से हिंदुस्तानी जहाज ईरान में दाखिल हो सकते हैं, जिससे अफगानिस्तान और सेंट्रल एशिया तक के बाजार भारतीय कंपनियों और कारोबारियों के लिए खुल जाएंगे।

जब तेहरान में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और ईरान के राष्ट्रपति रोहानी बातचीत की टेबल पर बैठे, तो पाकिस्तान और चीन दोनों की सांसें ऊपर नीचे हो रहीं थी। दोनों चालबाल पड़ोसियों के चक्रव्यूह को तोड़ने का मोदी ने 'पोर्ट' प्लान पहले से तैयार कर रखा था। बस, ईरान की रजामंदी की जरुरत थी। भारत और ईरान के बीच चाबहार पोर्ट को लेकर डील फाइनल हो गई।

ईरान को भी हिंदुस्तान जैसे दोस्त की जरुरत थी। इस दोस्ती से ईरान के कारोबार को भी नई उड़ान मिलेगी। लेकिन, हिंदुस्तान के लिए सबसे बड़ी डील चाबहार रही। चाबहार पोर्ट सामरिक और कारोबारी दोनों की नजरिए से भारत के लिए बहुत अहम है। ये चीन और पाकिस्तान को हिंदुस्तान का जवाब है। 

चाबहार पोर्ट तैयार होने से भारत और ईरान सीधे कारोबार कर सकेंगे। भारतीय और ईरानी जहाजों को पाकिस्तान के रूट से नहीं जाना पड़ेगा। चाबहार से भारत के लिए अफगानिस्तान में पहुंचना आसान हो जाएगा

पाकिस्तान के ग्वादर पोर्ट से करीब 80 किलोमीटर दूर है। चीन की चाल ग्वादर के रास्ते हिंदुस्तान को घेरने की थी। लेकिन, मोदी के ईरानी दांव ने चाबहार रूट न सिर्फ पाकिस्तान को चारों ओर से घेर लिया है। बल्कि, अफगानिस्तान तक अपनी पहुंच आसान बना लिया है। इस नए दांव से अब हिंदुस्तान आराम से पाकिस्तान और चीन दोनों की एक-एक चाल पर नजर रख सकेगा।

चाबहार पोर्ट तैयार होने से भारत की स्थिति एशिया में बहुत मजबूत हो जाएगी। इस पोर्ट से भारत के जहाज ईरान में दाखिल हो सकते हैं और इसके जरिए अफगानिस्तान और सेंट्रल एशिया तक के बाजार भारतीय कंपनियों और कारोबारियों के लिए खुल जाएंगे।

भारत ने एक ऐसा दांव चला है कि जिससे चीन की पूरी प्लानिंग फेल हो गयी है। चीन की रणनीति ग्वादर पोर्ट के जरिए हिंदुस्तान पर नजर रखने की थी। भारत को आगे बढ़ने से रोकने की थी। लेकिन, मोदी के चाबहार प्लान ने चीन और पाकिस्तान दोनों को 440 वोल्ट का झटका दे दिया।    तेहरान में दोस्ती की नई इबारत लिखी गयी। ईरान, भारत और अफगानिस्तान तीनों एक साथ आ गए। इससे चीन और पाकिस्तान दोनों परेशान है। चाहे भारत की सीमा हो या अफगानिस्तान की या फिर ईरान की, सरहद पर तनाव है। जिसकी बड़ी वजह पाकिस्तान है, जिसके साथ चीन खड़ा है। 

हिंदुस्तान, ईरान और अफगानिस्तान तीनों ही देशों एक चिंता है पाकिस्तान। तीनों ही देशों की सरहद पर तनाव की वजह भी पाकिस्तान ही है। ऐसे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एक ऐसे प्लान पर आगे बढ़े, जिससे पाकिस्तान बुरी तरह से घिर गया है। चीन की हिंदुस्तान को घेरने की चाल भी एक झटके में धूल फांकती दिखी। 

चाबहार दक्षिण-पूर्व ईरान का एक पोर्ट है। जिसके जरिए भारत पाकिस्तान को बाइपास कर अफगानिस्तान के लिए रास्ता बनाएगा। इससे भारतीय सामानों के ट्रांसपोर्ट का खर्च एक तिहाई हो जाएगा। समय की भी बहुत बचत होगी। चाबहार एक ऐसा ट्रांजिट हब बन जाएगा, जिससे ईरान और हिंदुस्तान का कारोबार बहुत बढ़ जाएगा। 

चाबहार से ईरान के मौजूदा रोड नेटवर्क को अफगानिस्तान में जरांज तक जोड़ा जा सकता है, जो पोर्ट से 883 किमी दूर है। 2009 में हिंदुस्तान द्वारा बनाए गए जरांज-डेलारम रोड के जरिए अफगानिस्तान के गारलैंड हाइवे तक आवाजाही आसान हो जाएगी। इस हाइवे से अफगानिस्तान के चार बड़े शहरों- हेरात, कंधार, काबुल और मजार-ए-शरीफ तक सड़क के जरिए पहुंचना आसान हो जाएगा।

चाबहार पोर्ट के विकास को लेकर 2003 में ही भारत और ईरान में समझौता हुआ था। लेकिन, ईरान पर पश्चिमी देशों के बैन की वजह से ये मामला लटका रहा। अब ईरान पर से पश्चिमी देशों का बैन हट गया है। उसके बाद से हिंदुस्तान ने चाबहार प्रोजेक्ट पर तेजी से काम करना शुरू कर दिया। 

चाबहार रणनीतिक और कारोबारी तौर पर इतना अहम है कि जापान ने भी ईरान से हाथ मिलाने की बहुत कोशिश की, लेकिन बात नहीं बनी। उधर, चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग जनवरी में ईरान गए थे। चीन ईरान और अमेरिका के बीच की दूरियों का फायदा उठाना चाहता था। लेकिन, बात नहीं बनी। ईरान के साथ भारत के रिश्ते पुराने हैं। कई मामलों में दोनों देश बहुत करीब है।

नरेंद्र मोदी को ईरान आने का न्यौता खुद वहां के प्रेसिडेंट हसन रोहानी ने दिया। ईरान रेलवे और आईटी सेक्टर में भारत से पहले ही मदद मांग चुका है। मोदी ने कूटनीति की बिसात पर जो दांव ईरान से चला है- वो हिंदुस्तान के लिए ना सिर्फ अफगानिस्तान बल्कि पूरे दक्षिण एशिया के लिए गेटवे का काम करेगा।