पीएम मोदी ने दी हाइफा के शहीदों को श्रद्धांजलि, ये हैं हाइफा का भारत से रिश्ता

नई दिल्ली (6 जुलाई): प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इजरायल दौरे के तीसरे और आखिरी करीब सौ साल पहले हाइफा में शहीद हुए हिंदुस्तानी जवानों को श्रद्धांजलि दी। पहले विश्व युद्ध में भारतीय जवानों ने आधुनिक हथियारों से लैस तुर्कों के खिलाफ लड़ते हुए सिर्फ तलवार और भाले के दम पर हाइफा की हिफाजत की थी।


इजराइल तब आजाद मुल्क नहीं था, इजराइल का तीसरा सबसे बड़ा शहर तब जंग का मैदान बना हुआ था। एक तरफ थी हाइफा में काबिज जर्मनी और तुर्की की सेना। दूसरी ओर थे जोधपुर, हैदराबाद और मैसूर के जांबाज सैनिक। ये दुनिया का इकलौता ऐसा युद्ध था जो तलवारों और बंदूकों के बीच हुआ। इस युद्ध में 900 भारतीय योद्धा शहीद हुए, लेकिन युद्ध के परिणाम ने एक अमर इतिहास लिख दिया। एक ऐसा इतिहास जो आज हर इजराइली बच्चे की जुबान पर है।


भारतीय रणबांकुरे जीते और चार सौ साल पुराने ओटोमैन साम्राज्य का अंत हो गया। प्रथम विश्व युद्ध में हिंदुस्तान के घुड़सवार शूरवीरों ने जर्मन और तुर्की की मशीनगनों का मुकाबला करते हुए इजरायल के हैफा शहर पर महज एक घंटे में कब्जा कर लिया था। इतिहास में इस लड़ाई को हाइफा की लड़ाई के नाम से जाना जाता है। इस लड़ाई में राजपूताने की जोधपुर रियासत की सेना का नेतृत्व जोधपुर रियासत के सेनापति दलपत सिंह शेखावत और कैप्टन अमान सिंह जोधा ने किया था।


अंग्रेजों ने भारतीय सेना को हाइफा पर कब्जा करने के आदेश दिया था। हाइफा पर कब्जा करने के लिए सेना आगे की ओर बढ़ी, लेकिन तभी अंग्रेजो ने दुश्मन की ताकत देखकर पीछे हटने का फैसला ले लिया। अंग्रेजो को हार का डर सता रहा था, लेकिन जोधपुर के युवराज और इस सेना के सेनापति मेजर दलपत सिंह ने साफ-साफ कहा कि हमारे यहां युद्ध के मैदान से पीठ दिखाकर लौटने का रिवाज नहीं है।


इसके बाद भयानक युद्ध हुआ और यही युद्ध 30 साल बाद इजराइल की आजादी की नींव बना। हाइफा में भी 8 भारतीय जवानों की समाधियां आज भी है। हर साल 23 सितंबर को भारतीय सेना द्वारा हायफा दिवस मनाया जाता है। हायफा की लड़ाई को प्रथम विश्व युद्ध के बहादुरी से लड़ी जाने वाली लड़ाईयों में से एक माना जाता है। इस विजय गाथा को इजराइली बच्चे अपने स्कूली सिलेबस में पढ़ते हैं। भारतीय सेनाओं के शौर्य, वीरता और बलिदान का सम्मान करते हुए इजरायल ने जगह-जगह उनकी स्मृति में मेमोरियल बनाए हैं। इजरायल 2018 में इस विजय दिवस की शताब्दी मनाएगा।


जोधपुर, हैदराबाद और मैसूर के जांबाजों की बहादुरी से अंग्रेज इतने प्रभावित हुए कि हाइफा के हीरोज़ की याद में फ्लैग इन स्टाफ हाउस बनवाया और सामने चौराहे पर तीनों ब्रिगेडों के सम्मान में तीन मूर्तियां लगाईं गईं। इन मूर्तियों के हाथ में भी हथियार के नाम पर भाला ही है। दिल्ली का तीन मूर्ति गोल चक्कर हाइफा की विजय और भारतीयों की बहादुरी का प्रतीक है।