10 हजार पार हुई पीएफ डिफाल्टर कंपनियों की संख्या

नई दिल्ली (9 अगस्त): सैलरी से प्रोविडेंट फंड (पीएफ) अमाउंट की काटने के बावजूद ईपीएफओ में ना जमा करने वाली कंपनियों (डिफाल्टर) की संख्या बेहद तेजी से बढ़ रही है। दिसंबर 2015 में यह संख्या 10,932 तक पहुंच गई है, इनमें 1195 सरकारी कंपनियां भी शामिल हैं।

देशभर की करीब 2,200 कंपनियों पर ईपीएफओ का कम से कम 2,200 करोड़ रुपए बकाया है। ऑनलाइन कंज्यूमर फोरम पर पीएफ से संबंधित शिकायतों का अंबार लगा हुआ है।

ऐसे बढ़ी घपलेबाजी... 2015-16 में ईपीएफ के लंबित मामलों में 23 फीसदी इजाफा हुआ है। इस संबंध में 228 पुलिस केस भी दर्ज हुए हैं। ईपीएफओ द्वारा डिफाल्टर कंपनियों के खिलाफ दर्ज कराए गए मुकदमों में भी करीब चार गुना बढ़ोतरी हुई है। 2012-13 में यह संख्या 317 थी, जो 2015 में बढ़कर 1491 हो गई। वहीं 2002 से 2015 के बीच ईपीएफओ अधिकारियों के खिलाफ 322 भ्रष्टाचार के मामले दर्ज हुए हैं। डिफाल्टर कंपनियों को बकाया राशि पर अवधि के हिसाब से 17 से 37 प्रतिशत के बीच पेनल्टी देनी होगी।

क्या है पीएफ का गणित... पीएफ सैलरी क्लास लोगों को भविष्य के लिए फाइनेंशियल सिक्योरिटी देने के लिए काटा जाता है। इसमें 12 प्रतिशत कर्मचारी को देना होता है, जबकि 13.6 प्रतिशत कंपनी को देना होता है। 19 से ज्यादा कर्मचारियों वाली कंपनियों को पीएफ सिस्टम लागू करना जरूरी होता है। इसके माध्यम से जमा राशि पर सरकार ब्याज (वर्तमान दर 8.8 फीसदी) भी देती है। सरकार यह राशि सिक्योरिटीज और कॉर्पोरेट बॉन्ड्स में निवेश करती है। कर्मचारी अपने पीएफ अकाउंट में जमा राशि रिटायरमेंट या नौकरी छोड़ने के दो महीने बाद निकाल सकते हैं। इसके अलावा घर, शिक्षा, शादी या बीमारी की स्थिति में कुछ हिस्सा निकालने की इजाजत होती है।

डिफाल्टर कंपनियों के मामले में टॉप-3 राज्य तमिलनाडु-पांडिचेरी    (2,644) महाराष्ट्र        (1,692) केरल-लक्षद्वीप    (1,118)

डिफाल्टर कंपनियों के मामले में टॉप-3 क्षेत्र

तिरुअनंतपुरम    (247) कोलकाता    (173) भुबनेश्वर    (115)

टॉप-3 डिफाल्टर कंपनियां एएआई     (192 करोड़ रुपए) एचबीएल ग्लोबल     (64.5 करोड़ रुपए) अहलूवालिया कॉन्ट्रैक्ट्स    (54.5 करोड़ रुपए)