कभी खाने के भी नहीं थे पैसे, आज है 7300 करोड़ का मालिक

नई दिल्ली (31 दिसंबर): नोटबंदी के बाद प्रधानमंत्री मोदी देश को कैशलेस इकोनॉमी की ओर ले जाने की कवायद में शिद्दत से जुटे हैं। देश में डिजिटल ट्रांजेक्शन पर जोर दे रहे हैं और पीएम मोदी के इस कैशलेस इंडिया को पंख लगा रहा है पेटीएम। पेटीएम भारत ही नहीं दुनियाभर में एक ब्रैंड बन चुका है।

पेटीएम के संस्थापक कोई और नहीं बल्कि यूपी के छोटे से शहर अलीगढ़ के एक निम्न मध्यम वर्गीय परिवार में जन्मे विजय शेखर शर्मा हैं। कभी ऐसा भी वक्त था जब विजय शेखर शर्मा को वक्त की रोटी भी ठीक से नसीब नहीं थी। इनके जेव में खाने तक के लिए पैसे नहीं होते थे और बहाने से दोस्तों के यहां जाकर अपनी भूख मिटाया करते थे। लेकिन इन्होंने कभी हिम्मत नहीं हारी। मेहनत और लगन से अपने सपने को पूरा करने में जुटे रहे। 1997 में इन्होंने महज 2 लाख रुपए में One-97 नाम की कंपनी की शुरुआत की शुरुआत की और आज देखते ही देखते ये एक ब्रांड बन चुके हैं, 7300 करोड़ के मालिक है।

12वीं के बाद विजय शेखर शर्मा ने दिल्ली कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग में बीटेक दाखिला लिया। लेकिन अंग्रेजी कमजोर होने की वजह से वहां इनका मन नही लगा। यहां पूरी पढ़ाई अंग्रेजी में होती थी लिहाजा टीचर क्या पढ़ा रहे हैं इन्हें समझ में ही नहीं आता था। इसलिए वे बैक बेंच पर बैठते थे। क्लासमेट उन्हें बैक बेंचर कहकर चिढ़ाते थे। एक वक्त ऐसा भी आया, जब उन्होंने कॉलेज जाना ही छोड़ दिया था। लेकिन हार नहीं मानने की उनकी जिद के आगे अंग्रेजी भी कमजोर पड़ गई। डिक्शनरी से हिंदी को अंग्रेजी में ट्रांसलेट करके पढ़ते थे। इंग्लिश किताबों, मैगजीन्स और दोस्तों की मदद से विजय फर्राटे से अंग्रेजी बोलना सीख गए।

एक इंटरव्यू में उन्होंने बताया था, मेरी इंग्लिश काफी कमजोर थी। जब मैंने दिल्ली कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग में एडमिशन लिया तो वहां काफी हीन भावना का सामना करना पड़ा। वहां सब फर्राटेदार इंग्लिश बोलते थे, जबकि हिंदी मीडियम से पढ़ाई होने के चलते मेरी इंग्लिश काफी कमजोर थी। मुझे डर लगा रहता था कि कहीं कोई प्रोफेसर इंग्लिश में कोई सवाल न पूछ ले। इसीलिए मैं क्लास बंक करके टाइम पास के लिए कम्‍प्यूटर लर्निंग क्लास में चला जाता था।

बाद में दिल्ली के टेक्नोलॉजिकल यूनिवर्सिटी से इलेक्ट्रानिक एंड कम्युनिकेशन इंजीनियरिंग की तो लगा कि जो काम वे अमेरिका में कर सकते थे, वो काम देश में रहकर भी किया जा सकता है।

घर पर बिजनेस करने का बहुत विरोध हुआ। घरवाले चाहते थे कि वे नौकरी करें, लेकिन उनका मन खुद की कंपनी बनाने का था। घर में नौकरी वाला ही माहौल था। पापा स्कूल में टीचर थे, मम्मी हाउस वाइफ थीं।

हॉटमेल के संस्थापक सबीर भाटिया और याहू के संस्थापक जेरी यांग एवं डेविड फिलो को विजय शेखर शर्मा अपना आदर्श मानते हैं।विजय ने कुछ महीने नौकरी भी की, लेकिन कंपनी खोलने के जूनून ने ज्यादा वक्त तक उन्हें टिकने नहीं दिया।

2001 में 2 लाख रुपए लगाकर One-97 नाम की कंपनी की शुरुआत की, जो मोबाइल से जुड़ी वैल्यू ऐडेड सर्विसेस देती थी। कॉमर्स में ज्यादा अनुभव न होने के कारण कंपनी की हालत एक साल में ही खराब होने लगी। खाने-पीने के लिए भी उनके पास पैसे तक नहीं बचे। दो वक्त सिर्फ चाय पीकर ही गुजारा करते थे। पैसे बचाने के लिए वे बस के बजाए पैदल चलते थे। घर-घर जाकर कम्‍प्यूटर के छोटे-मोटे काम करते थे।

2004 तक उनकी हालत इतनी खराब थी कि जो भी शादी का रिश्‍ता लेकर आते थे, वो असलियत जानने के बाद दोबारा लौटकर नहीं आते थे। जब कंपनी की हालत बिल्‍‍कुल खराब हो गई तो वे निराश हो गए। लेकिन ये सोच लिया था कि जो करना है, वो इसी में करना है। उसी समय मोबाइल के क्षेत्र में ग्रोथ हुआ और ज्‍यादातर लोग अपना काम मोबाइल पर करने लगे। इस दौरान उनकी कंपनी की भी धीरे-धीरे ग्रोथ होने लगी। लोगों में इंटरनेट बेस्ड कामों की मांग बढ़ने लगी। 2005 में पहली बार कंपनी प्रॉफिट में आई।

विजय शेखर शर्मा 2011 में Paytm को लॉन्च किया था। Paytm के शुरू होने की कहानी भी बड़ी दिलचस्प है। किराने का सामान या ऑटोवाले को पैसे देते वक्त छुट्टे की दिक्कत ने उनको Paytm जैसी कंपनी बनाने के लिए प्रेरित किया। आज नोटबंदी के दौर में Paytm सभी का सहारा बन गया है।