नकली दवा को ब्रांडेड के रैपर में 6 गुनी कीमत पर बेचते हैं ड्रग माफिया

नई दिल्ली ( 24 अप्रैल ): ड्रगमाफिया जहां नकली दवा से लेकर एक्सपायरी दवा का धंधा करते हैं वहीं इन लोगों का एक और बड़ा खेल चलता है। नकली दवा से लेकर एक्सपायरी दवा का धंधा चलता है। इन लोगों का एक और बड़ा खेल चलता है। ये देश के कई शहरों में स्थित दवा की छोटी कंपनियों से ब्रांडेड कंपनियों की दवाएं बनवाते हैं।


फिर वह वहां से दवाएं मंगवाकर उन पर ब्रांडेड कंपनियों के रैपर लगाकर बेच देते हैं। इसमें धंधेबाजों को बड़ा मुनाफा होता है। छोटी कंपनियां सब स्टैंडर्ड दवा बनाने में ब्रांडेड कंपनियों की तरह महंगे कंपोजिशन नहीं मिलाती हैं। इसी वजह से नकली दवा की क्षमता कम रहती है। नतीजा यह होता है कि ऐसी दवा खाने के बाद भी रोगी को फायदा नहीं होता है। जानकारों के अनुसार दो नंबर की दवा की क्षमता 25 फीसदी से ज्यादा नहीं रहती है।


औषधि निरीक्षकों का कहना है कि ड्रग माफियाओं का रैकेट दवा दुकानदारों से लेकर हॉकर तक है। जिले के दुकानदारों को पता रहता है कि दो नंबर की दवा किस हॉकर के पास है। वह पटना आकर इसे ले जाता है और ग्रामीण इलाके में बेच देता है। ग्रामीणों को इसकी कम जानकारी रहती है कि कौन ब्रांडेड है और गैर ब्रांडेड। लोग केवल दवा की पैकिंग और कलर देखते हैं।


पटना पुलिस और औषधि नियंत्रक विभाग ने नकली व अवैध दवाओं के खिलाफ अभियान चलाया। इस दौरान बिहार की राजधानी पटना के कदमकुआं, पत्रकार नगर, बहादुरपुर,  आलमगंज सहित कई थाना क्षेत्रों में छापेमारी कर करीब तीन करोड़ की नकली दवाएं बरामद की गयीं।

ड्रग माफिया ब्रांडेड कंपनियों की वहीं दवाएं छोटी कंपनियों बनवाते हैं जो ज्यादा बिकती है। इस धंधे में इसे चालू आइटम कहा जाता है। 


धंधेबाज ओरिजनल प्रोडक्ट लेकर गुजरात , महाराष्ट्र , यूपी सहित अन्य राज्यों में स्थित दवा बनाने वाली छोटी कंपनियों में जाते हैं। कंपनियों को कहा जाता है कि इसी तरह का प्रोडक्ट और पैकिंग चाहिए। ये कंपनियां कम पैसे में ही ब्रांडेड का नकल कर दवा बना देती हैं।

टैबलेट और कैप्सूल में 4 तरह की पैकिंग होती है। खबरों के मुताबिक ब्रांडेड कंपनी के दस टैबलेट की कीमत यदि 60 रुपए है तो दो नंबर की दवा की लागत धंधेबाजों को 10 से 20 रुपए आती है।