पारसी नववर्ष नवरोज: पारसी समाज से जुड़ी वो बातें जो आप नहीं जानते

नई दिल्ली (17 अगस्त): आज देश का पारसी समुदाय अपना नववर्ष नवरोज़ मना रहा है। इस मौके पर राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी पारसी समुदाय को उनके नववर्ष पर देश की ओर से बधाई दी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ट्वीट किया, पारसी समुदाय को नवरोज़ मुबारक। उम्मीद करते हैं कि आने वाला साल ढेरों खुशियां, सफलता और अच्छा स्वास्थ्य लेकर आए।

क्या है नवरोज - पारसी समुदाय के लिए नववर्ष नवरोज़ यानी नया दिन आस्था और उत्साह का संगम है।  - नवरोज़, फारस के राजा जमशेद की याद में मनाते हैं जिन्होंने पारसी कैलेंडर की स्थापना की थी।  - इस दिन पारसी परिवार के लोग नए कपड़े पहनकर अपने उपासना स्थल फायर टेंपल जाते हैं। - प्रार्थना के बाद एक दूसरे को नए साल की मुबारकबाद देते हैं।  - साथ ही इस दिन घर की साफ-सफाई कर घर के बाहर रंगोली बनाई जाती है और कई तरह के पकवान भी बनते हैं।  - पारसी समुदाय देश की सबसे कम आबादी वाले अल्पसंख्यक समुदायों में से एक है।  - लेकिन नवरोज़ जैसे त्योहार के माध्यम से इस समुदाय ने आज भी अपनी परंपराओं को बनाए रखा है। 

इतिहास - 1380 ईसा पूर्व जब ईरान में धर्म-परिवर्तन की लहर चली तो कई पारसियों देश छोड़कर भागना पड़ा। - जिसके बाद पारसी कम्युनिटी के लोग भारत, अमेरिका और ब्रिटेन में बसे।  - भारत में भले ही आज ये कम्युनिटी सबसे समृद्ध है, लेकिन आज इनकी तादाद बेहद कम रह गई है। - पारसी कम्युनिटी अपने धर्म के संस्कारों को आज तक सहेजे रखा है।  - सबसे खास बात ये कि समाज के लोग धर्म-परिवर्तन के खिलाफ होते हैं। - अगर पारसी समाज में लड़का-लड़की किसी दूसरे धर्म में शादी कर ले, तो उसे धर्म में रखा जा सकता है। - लेकिन उसके पति/पत्नी और बच्चों को धर्म में शामिल नहीं किया जाता है।  - भगवान प्रौफेट जरस्थ्रु का जन्मदिवस 24 अगस्त को मनाया जाता है। 

मान्यताएं - हिंदू धर्म की तरह ही पारसियों में भी अग्नि को पवित्र माना जाता है तथा अग्नि की पूजा की जाती है।  - इनके मंदिर को आताशगाह या अग्नि मंदिर (फायर टेंपल) कहा जाता है। - पिछले करीब तीन हजार वर्षों से पारसी धर्म के लोग दोखमेनाशिनी नाम से अंतिम संस्कार की परंपरा को निभाते आ रहे हैं।  - इस परंपरा के तहत एक टॉवर में शव डाल दिया जाता है, यह गिद्ध उस शव को नष्ट करते हैं। - पारसी कम्युनिटी के लोग एक ईश्वर को मानते हैं जो 'आहुरा माज्दा' कहलाते हैं।  - ये लोग प्राचीन पैगंबर जरस्थ्रु की शिक्षाओं को मानते हैं।  - पारसी लोग आग को ईश्वर की शुद्धता का प्रतीक मानते हैं और इसीलिए आग की पूजा करते हैं। - जरस्थ्रु का जन्म लगभग तीन हजार वर्ष पूर्व एक कुंआरी माता “दुघदोवा” से हुआ था।  - जरस्थ्रु के नाम पर ही पारसियों का धर्म जोरोस्ट्रियन कहलाता है। - “किस्सा ए संजान” पारसियों का सबसे महत्वपूर्ण ग्रंथ है, जिसकी रचना बहमान कैकोबाद ने की थी।

परम्पराएं - पारसियों के लिए 3 मौके साल में सबसे खास हैं।  - एक खौरदाद साल, प्रौफेट जरस्थ्रु का जन्मदिवस और तीसरा 31 मार्च।  - इराक से कुछ सालों पहले आए अनुयायी 31 मार्च को भी नववर्ष मनाते हैं। - नववर्ष पारसी समुदाय में बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है।  - पारसी धर्म में इसे खौरदाद साल के नाम से जाना जाता है।  - पारसियों में 1 वर्ष 360 दिन का और शेष 5 दिन गाथा के लिए होते हैं। - गाथा यानी अपने पूर्वजों को याद करने का दिन।  - साल खत्म होने के ठीक 5 दिन पहले से इसे मनाया जाता है।  - इन दिनों में समाज का हर व्यक्ति अपने पूर्वजों की आत्मशांति के लिए पूजन करता है।  - इसका भी एक खास तरीका है। रात 3.30 बजे से खास पूजा-अर्चना होती है।  - धर्म के लोग चांदी या स्टील के पात्र में फूल रखकर अपने पूर्वजों को याद करते हैं।

पारसी समुदाय की जनसंख्या क्यों हो रही है कम - देश में साल 2001 से 2011 के बीच पारसी समुदाय की आबादी में 18 फीसदी की कमी आयी है।  - समुदाय की जनसंख्या 2001 में 69,601 थी, जो 2011 तक 57,264 हो गई। - 2011 में पारसी-जरथ्रुस्थ समुदाय की कुल जनसंख्या 57,264, जिसमें 28,115 पुरुष और 29,149 महिलाएं हैं। - पिछली बार 1981 की जनगणना में करीब 27 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई थी।  - साल 1971 में पारसी समुदाय की आबादी 91,266 थी, जो 1981 में कम होकर 71,630 रह गई। - पारसी समुदाय के सबसे ज्यादा लोग (9727) गुजरात में रहते हैं, जबकि दिल्ली में महज 221 लोग निवास करते हैं।