पटेल को पाकिस्तान किसी भी शर्त पर मंजूर नहीं था !

 

नई दिल्ली (31 अक्टूबर): 1947 में भारत ने आज़ादी की सांस ली। स्वतंत्र भारत के पहले तीन वर्ष सरदार पटेल उप-प्रधानमंत्री, भारत के प्रथम गृहमंत्री, सूचना मंत्री और राज्यमंत्री रहे। स्वतंत्रता के बाद सरदार पटेल के सामने लगभग साढ़े पांच सौ से भी ज़्यादा देशी रियासतों का एकीकरण करना, एक जटिल समस्या थी। जिसे सरदार पटेल शांतिपूर्ण और कुशल कूटनीति से सफल करना चाहते थे और वे अपने इस मिशन में सफल भी हुये।

5 जुलाई 1947 को पटेल ने रियासतों के प्रति अपनी नीति स्पष्ट रूप में रखी और कहा:- ”रियासतों को तीन विषयों ‘सुरक्षा, विदेश तथा संचार व्यवस्था, के आधार पर भारतीय संघ में शामिल किया जायेगा।”उनकी इस स्पष्टवादिता के कारण धीरे-धीरे बहुत सी रियासतों ने स्वेच्छा से भारत में विलय होने का प्रस्ताव स्वीकार किया।

लेकिन कई देशी रियासतें अभी भी बाकी थी जो भारतीय संघ में विलय होना नही चाहती थी। उन रियासतों में हैदराबाद, जूनागढ़ और कश्मीर प्रमुख थे। पटेल ने पीवी मेनन के साथ मिलकर देशी राजाओं को बहुत समझाया कि उन्हें स्वायत्तता देना संभव नही है। अंत में जूनागढ़ के विरुद्ध बहुत विरोध हुआ तो वहाँ का नवाब पाकिस्तान भाग गया। हैदराबाद के खिलाफ सैन्य बल भेजा गया तो हैदराबाद के निजाम ने आत्मसमर्पण कर दिया। इस तरह जूनागढ़ और हैदराबाद को भारतीय संघ में मिलाया गया जो भारतीय इतिहास की बहुत बड़ी उपलब्धि थी। भारत की आज़ादी के बाद भी 18 सितंबर 1948 तक हैदराबाद अलग ही था। गाँधी जी ने सरदार पटेल को रियासतों के बारें में लिखा था – रियासतों की समस्या इतनी जटिल थी जिसे केवल तुम ही हल कर सकते थे।

सरदार पटेल कश्मीर को भी बिना शर्त भारत में संपूर्ण रूप से जोड़ना चाहते थे लेकिन नेहरू जी ने कश्मीर समस्या को अंतराष्ट्रीय समस्या कह कर अपने पास रख लिया। अगर कश्मीर का निर्णय नेहरू जी के बजाए सरदार पटेल के पास होता तो कश्मीर भारत के लिए आज समस्या नहीं बल्कि गौरव का विषय होता। देशी रियासतों के एकीकरण में सरदार पटेल को कई पेचिदगियों का सामना करना पड़ा। लक्षद्वीप समूह को भारत में मिलाने का सारा श्रेय पटेल को ही जाता है। उन्होनें पाकिस्तान से पहले ही भारतीय नौ सेना का जहाज़ भेजा और वहाँ भारत का तिरंगा फहराया, जिसके परिणाम स्वरूप पाकिस्तान को अपना जहाज़ वापिस बुलाना पड़ा। यह थी सरदार पटेल की दूरदर्शिता। पाकिस्तान के रूप में भारत का विभाजन नहीं चाहते थे सरदार पटेल, पर कई राजनीति दबाव व भारत की स्वतंत्रता को खतरे में देखते हुए उन्हें अपनी मंज़ूरी देनी पड़ी।