INSIDE STORY: भारत-अमेरिका की दोस्ती से डरा पाकिस्तान, चीन की शरण में


डॉ. संदीप कोहली,

नई दिल्ली (25 मई): अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अमेरिका समेत दुनिया के सभी देश भारत के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े हैं वहीं पाकिस्तान पूरी दुनिया में अलग-थलग पड़ चुका है। हाल ही में इसका नमुना सऊदी अरब की राजधानी रियाद में देखने को मिला। रियाद में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से मुलाकात के इरादे से पहुंचे पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ का मिलना तो दूर उन्हें मंच से भाषण तक नहीं देने दिया गया। उल्टा ट्रंप ने भारत का साथ देते हुए उसे आतंकवाद से प्रभावित देश बताया। भारत के प्रति अमेरिका के बढ़ते झूकाव से पाकिस्तान पूरी तरह हताश और निराश हो चुका है। ऐसे में संभावना है कि पाकिस्तान अमेरिका को छोड़ चीन की शरण में पहुंच सकता है। ऐसा अमेरिका के राष्ट्रीय खुफिया निदेशक डेनियल कोट्स का कहना है। पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपने प्रति बढ़ते अलगाव, भारत और अमेरिका के मजबूत होते संबंधों और भारत के बढ़ते अंतरराष्ट्रीय प्रभाव को ध्यान में रखते हुए पूरी तरह से चीन की तरफ अपना झुकाव बढ़ा सकता है। कोट्स ने यह वक्तव्य सीनेट की आर्म्ड सर्विस कमेटी के सामने दिया। कोट्स ने कहा इस साझेदारी को मजबूत करने से चीन को हिंद महासागर में प्रभाव बढ़ाने में मदद मिलेगी। लेकिन अब सवाल उठता है कि क्या चीन वाकई में पाकिस्तान का दोस्त है या इस दोस्ती के कुछ अलग ही मायने हैं। हकीकत में चीन पाकिस्तान को अपना दोस्त कम उपनिवेश ज्यादा समझता है। जिसका संदेह पाकिस्तान की जनता, वहां के सांसद पहले ही जता चुके हैं। उनका मानना है कि चीन ने ईस्ट इंडिया कंपनी की तरह पाकिस्तान पर कब्जे की तैयारी शुरू कर दी है और यह सब चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर यानी CPEC के तहत किया जा रहा है। ऐसा डेनियल कोट्स का भी मानना है। कोट्स ने कहा कि पाकिस्तान आतंकवादियों पर अंकुश लगाने में विफल रहा है ऐसे में चीन-पाकिस्तान इकनॉमिक कॉरिडोर आतंकियों का अगला टारगेट होगा। चीन को भी CPEC की सुरक्षा को लेकर पाकिस्तानी सेना पर भरोसा नहीं है इसीलिए उनके अपने 30 हजार सैनिक CPEC की सुरक्षा में लगा रखे हैं।


कैसे हो रही है पाकिस्तान पर कब्जे की तैयारी- मौजूदा दौर मे चीन की घरेलू इकॉनोमी कमजोर पड़ती जा रही है। जिसके चलते उसने विदेशी निवेश बढ़ाने की कोशिशें तेज की हैं। चीन वन रोड, वन बेल्ट प्रॉजेक्ट के तहत ग्लोबल नेटवर्क तैयार करना चाहता है। अब वो अपना सामान चीन की जगह उसी देश में बनाना चाहता है जहां उसे व्यापार करना है। इसी के लिए चीन पाकिस्तान में सड़क और रेलमार्गों का निर्माण कर रहा है। इसी कड़ी में अब चीनी कंपनियां पाकिस्तान में बड़े पैमाने पर कारोबार का विस्तार करने के लिए जमीन खरीदने में जुटी हैं। चीन ने हाल ही में पाकिस्तान के साथ ट्रेड रूट विकसित करने के लिए बड़ी डील की थ। चीनी कंपनियों के टारगेट पर पाकिस्तान के सीमेंट, स्टील, एनर्जी और टेक्सटाइल सेक्टर्स ह। पाकिस्तान इसे अपनी इकॉनोमी की रीढ़ मान रहा है। लेकिन हकीकत में चीन उसके घरेलू उद्योगों पर कब्जे की तैयारी शुरू कर चुका है। हाल ही में एक चीनी ने पाकिस्तान के स्टॉक एक्सचेंज में बड़ा हिस्सा लिया है। इसके अलावा शंघाई इलेक्ट्रिक पावर ने पाकिस्तान की सबसे बड़ी एनर्जी फर्म K-इलेक्ट्रिक का अधिग्रहण किया है। चीन की दिग्गज स्टील कंपनी बाओस्टील ग्रुप की पाकिस्तान की सरकारी स्टील कंपनी के अधिग्रहण पर बात चल रही है


पाकिस्तान के सांसद कह चुके CPEC से चीन का गुलाम बन जाएगा पाकिस्तान- CPEC को पाक सीनेट की एक विशेष कमेटी ने भी विफल करार दिया है। सीनेट की स्थायी समिति के अध्यक्ष ताहिर मशहादी ने चीन पर लगाया है आरोप। डॉन अखबार के अनुसार CPEC समुद्र के किनारे एक और ईस्ट इंडिया कंपनी है। CPEC से पाकिस्तान के राष्ट्रीय हितों की रक्षा नहीं की जा रही है। CPEC पर बलोचिस्तान के मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने भी आरोप लगाया है। कार्यकर्ताओं का कहना है कि यह प्रोजेक्ट बलोचियों के संसाधनों को लूटने का षडयंत्र है। कार्यकर्ताओं ने हाल ही में लंदन में चीनी दूतावास के बाहर CPEC को लेकर प्रदर्शन भी किया। प्रोजेक्ट की समीक्षा के लिए बनाई गई हैदर कमेटी ने भी अपनी रिपोर्ट में इसे विफल माना है। कमेटी ने कहा कि कॉरिडोर के 1,674 किमी पश्चिमी हिस्से में सरकार की प्राथमिकता में नहीं। डॉन अखबार के अनुसार ग्वादार पोर्ट तक जो सड़क बननी थी वहां निर्माण संभव ही नहीं। रिपोर्ट के मुताबिक पोर्ट बन भी गया तो बिजली नहीं मिलेगी क्योंकि ट्रांसमिशन लाइनों का काम ही नहीं हुआ।


CPEC से चीन को सिर्फ होगा फायदा- 1 दिसंबर 2016 को चीन ने पाकिस्तान अपनी पहली रेलगाड़ी भेजी। उसने दक्षिण में स्थित कुन्मिंग से कराचीतक मालगाड़ी सेवा शुरू की। ये रेल लाइन करीब 3500 किलोमीटर की दूरी तय करेगी। युन्नान से होते हुए तिब्बत के रास्ते ये मालगाड़ी गिलगित-बल्तिस्तान में प्रवेश करेगी। वहां से इस्लामाबाद, लाहौर होते हुए कराची पहुंचेगी। यहां से सामान ग्वादर पोर्ट तक पहुंचाया जाएगा। इससे साऊथ चाइना सी को अरब सागर से सीधा जोड़ दिया गया है।


क्या है चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर (CPEC), जानिए...

    *चीन ने सीपीईसी परियोजनाओं में 46 अरब डॉलर यानी लगभग 3 लाख करोड़ रुपए निवेश किया है।

    *इस प्रोजेक्ट की शुरूआत 2015 में हुई थी, इसके पूरा होने तक 3 हजार किमी का रेल-सड़क नेटवर्क तैयार हो जाएगा।

    *सड़क नेटवर्क तैयार के साथ-साथ रेलवे और पाइपलाइन लिंक भी पश्चिमी चीन से दक्षिणी पाकिस्तान को जोड़ेगा।

    *अभी चीन को ग्वादर पोर्ट जाने के लिए 12 हजार किमी के समुद्री मार्ग से सफर तय करना पड़ता है।

    *सीपीईसी प्रोजेक्ट पूरा होने के बाद चीन को अपने बॉर्डर से सिर्फ 1800 किमी का सफर तय करना पड़ेगा।

    *बीजिंग से ग्वादर पोर्ट की दूसरी महज आधी से भी कम (5200 किमी) रह जाएगी।

    *चीन द्वारा बनाया जा रहा ये कॉरिडोर बलूचिस्तान प्रांत से होकर गुजरेगा, जहां दशकों से लगातार अलगाववादी आंदोलन चल रहे हैं।

    *इसके साथ-साथ गिलगिट-बल्टिस्तान और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर का इलाका भी शामिल है।

    *सीपीईसी, चीन के राष्ट्रपति जिनपिंग के सिल्क रोड इकोनॉमिक बेल्ट और 21वें मेरीटाइम सिल्क रोड प्रोजेक्ट का हिस्सा है।

    *चीन को उम्मीद है कि इस कॉरिडोर के जरिए वह अपनी ऊर्जा को तेजी से फारस की खाड़ी तक पहुंचा सकता है।

    *चीन की योजना इन दोनों विकास योजनाओं को एशिया और यूरोप के देशों के साथ मिलकर आगे बढ़ाने की है।

    *वहीं, कॉरिडोर के जरिए पश्चिमी चीन में वित्तीय विस्तार मिलने की उम्मीद है, जो कि बंद इलाका है।

    *इसके साथ-साथ चीन की योजना अपने गिलगिट-बल्टिस्तान में अपने पैर जमाने की है,जहां लगातार अलगाववादी आंदोलन हो रहे हैं।

    *सीपीईसी प्रोजेक्ट के लिए पाकिस्तान में मौजूद चीनी नागरिकों की सुरक्षा के लिए करीब 21 हजार पाकिस्तानी सैनिक तैनात किए गए हैं।

    *अगस्त में गिलगिट-बल्टिस्तान और पीओके लोगों ने पाकिस्तान और चीन के खिलाफ विरोध प्रदर्शन शुरू किया गया है।

    *वहां के नागरिकों का आरोप है कि दोनों देश अपने फायदे के लिए इस इलाके के प्राकृतिक संसाधनों का दोहन कर रहे हैं।

    *नागरिकों का आरोप है कि इस योजना में चीन के कामगारों को लगाया गया है, जबकि स्थानीय युवा बेरोजगार हैं।