जानें क्या वाकई जरूरी था ऑपरेशन ब्लू स्टार ?

नई दिल्ली (6 जून): बंटवारे की आग ने पंजाब को तोड़कर रख दिया। यही वो वक्त था जब पंजाब में कट्टरपंथी विचारधारा जन्म लेने लगी। सिखों के सबसे बड़े तीर्थ स्वर्ण मंदिर समेत सभी गुरुद्वारों का प्रबंधन शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधन कमेटी के अधीन आ चुका था और एसजीपीसी की पॉलिटिकल विंग शिरोमणि अकाली दल सिख अस्मिता की राजनीति शुरू कर चुका था।

आनंदपुर साहिब में अलग सिख राज्य समेत पंजाब के लिए कई मांगें रखी गईं जो अकाली राजनीति का आधार बन गईं। इसी बीच अमृतसर से कुछ दूर चौक मेहता के दमदमी टकसाल में सात साल के एक लड़के ने सिख धर्म की पढ़ाई शुरू की। उसका नाम था जरनैल सिंह भिंडरावाले। कुछ ही सालों में भिंडरावाले की धर्म के प्रति कट्टर आस्था ने उसे टकसाल के गुरुओं का प्रिय बना दिया। जब टकसाल के गुरु की मौत हुई तो उन्होंने अपने बेटे की जगह भिंडरावाले को टकसाल का प्रमुख बना दिया। आज भी टकसाल में भिंडरावाले को शहीद का दर्जा दिया जाता है।

1966 में केन्द्र सरकार ने हिमाचल और हरियाणा को निकाल कर सिख बाहुल्य अलग पंजाब की मांग मान ली। लेकिन सिख राजनीति पर पकड़ बनाए रखने के लिए अकालियों ने चंडीगढ़ को पंजाब में मिलाने और पंजाब की नदियों पर हरियाणा और राजस्थान के अधिकार खत्म करने की मांग शुरू कर दी। कई जानकार मानते हैं कि ऐसे वक्त में इंदिरा गांधी को जरूरत थी ऐसे नेता की जो अकालियों की राजनीति खत्म कर सके। अब ये एक खुला सच है कि कांग्रेस ने इसी काम के लिए भिंडरावाले को प्रमोट किया। जानकार मानते हैं कि भिंडरावाले की अपनी कोई राजनीतिक महत्वाकांक्षा नहीं थी। भिंडरावाले ने निरंकारियों की खिलाफत के साथ कट्टरपंथी राजनीति की शुरुआत की।

1978 में अमृतसर में निरंकारियों के सम्मेलन के दौरान भिंडरावाले समर्थकों और निरंकारियों के बीच जानलेवा झगड़ा हुआ जिसमें भिंडरावाले के 13 समर्थक मारे गए। इस एक घटना ने भिंडरावाले को हिंसा का लाइसेंस दे दिया। भिंडरावाले पर तीन हाई प्रोफाइल हत्याओं के आरोप लगे लेकिन कांग्रेस के राज में ये आरोप कभी साबित नहीं हो पाए।

पंजाब अब राजनीतिक हत्याओं का अखाड़ा बन चुका था। सरेआम लोगों को बस से निकाल कर कत्ल कर दिए जाने की खबरें आने लगीं। ग्रामीण सिख भिंडरावाले से जुड़ने लगे। भिंडरावाले को भी अहसास होने लगा कि वो सिख हितों का अकेला रखवाला बन चुका है। देश-विदेश में भिंडरावाले की लोकप्रियता आसमान छूने लगी।

इस वक्त तक भी केन्द्र की इंदिरा गांधी सरकार ने भिंडरावाले को रोकने की कोशिश नहीं की। ना ही पंजाब में शांति के लिए अकालियों से समझौता किया। जबकि एसजीपीसी अध्यक्ष तोहड़ा और अकाली नेता लोंगोवाल का अब भी प्रभाव था और वो समझौते के लिए बार-बार दिल्ली आने को राजी थे।

साल 1982 में भिंडरावाले ने अचानक अपना हेडक्वॉर्टर स्वर्ण मंदिर के अंदर अकाल तख्त में बनाने की कवायद शुरू कर दी। उसे लगने लगा था कि अब सरकार उसपर एक्शन ले सकती है। लेकिन भिंडरावाले को भरोसा था कि सेना मंदिर के भीतर घुसने की हिम्मत नहीं करेगी। अकाल तख्त में अपना हेडक्वार्टर बनाने के लिए भिंडरावाले ने तोहड़ा को राजी कर लिया। मुख्यमंत्री बनने की राजनीतिक महत्वाकांक्षा पाल रहे तोहड़ा को भी आखिर भिंडरावाले की जरूरत थी।

सरकार को ये खबर मिल चुकी थी कि भिंडरावाले ने स्वर्ण मंदिर को किले में तब्दील करना शुरू कर दिया है और मंदिर के अंदर हथियारों का बड़ा ज़खीरा आ चुका है। अब ये तय हो गया था कि सिखों के सबसे पवित्र तीर्थ पर आर्मी एक्शन होगा। लेकिन किसी ने ये नहीं सोचा था कि ऑपरेशन ब्लू स्टार का स्वरूप इतना भयानक होगा। सेना के मुताबिक आखिरी वक्त तक भिंडरावाले को आत्मसमर्पण का मौका दिया गया लेकिन भिंडरावाले ने अपना रास्ता तय कर लिया था। वो अपने लोगों के बीच शहादत का दर्जा हासिल करना चाहता था।