ओलिंपियन लक्खा सिंह टैक्सी चलाने को मजबूर

नई दिल्ली ( 25 दिसंबर ): एक ओर जहां देश में खेलों को बढ़ावा देने की बातें चल रही हैं, वहीं एक ओलिंपियन अपनी जिंदगी चलाने टैक्सी चलाने पर मजबूर है। भारतीय खेल जगत के लिए इससे बुरी बात क्या हो सकती है कि एक ओलिंपियन दो समय के भोजन के लिए संघर्ष कर रहा है। 

लक्खा सिंह नाम का यह खिलाड़ी युवा मुक्केबाजों को ट्रेनिंग देकर देश को कुछ और पदक दिला सकता था पर साथी खिलाड़ी से मिले धोखे और खेल संघों, सरकारों द्वारा नजरअंदाज किए जाने की वजह से वह बदहाल हैं।

लक्खा सिंह भारत के युवा बॉक्सर्स को ट्रेनिंग देकर देश को कुछ और पदक दिला सकते थे, लेकिन वह जीवनयापन के लिए टैक्सी चलाने को मजबूर हैं। साथी खिलाड़ी से मिले धोखे और खेल संघों, सरकारों द्वारा नजरअंदाज किए जाने की वजह से उनकी जिंदगी बेहद खराब दौर से गुजर रही है।

लक्खा ने 1994 के हिरोशिमा एशियाड में 81 किलो कैटिगरी में देश के लिए ब्रॉन्ज मेडल जीता था। पांच बार के नैशनल चैंपियन रहे लक्खा ने 1994 में तेहरान में आयोजित एशियन बॉक्सिंग चैंपिनशिप में भी सिल्वर मेडल हासिल किया था और अगले ही साल इसी चैंपियनशिप में दूसरा सिल्वर मेडल जीतकर अपना लोहा मनवाया। 

दो साल में तीन अंतरराष्ट्रीय पदक जीतने वाले लक्खा सिंह 1996 के अटलांटा ओलिंपिक में भारत के सबसे चमकदार सितारे थे। उनसे यहां भी मेडल की उम्मीद की जा रही थी, लेकिन एशियन लेवल के अपने खेल को वह ओलिंपिक मेडल में नहीं बदल सके और 91 किलो कैटिगरी में 17वें नंबर पर रहे। 1990 के मध्य तक अंतरराष्ट्रीय स्तर की बॉक्सिंग प्रतियोगिताओं में मेडल के लिए सबसे ज्यादा उम्मीद उनसे ही की जाती थी। शानदार खेल और देश के लिए उनका समर्पण एक धोखे की वजह से धूमिल हो गया। अब राज्य सरकार ओर बॉक्सिंग फेडरेशन से उन्हें कोई मदद नहीं मिल रही है। 

52 वर्षीय पूर्व बॉक्सर ने एक अंग्रेजी अखबार से कहा, 'मैंने अपनी स्थिति को लेकर भारतीय अमेचर बॉक्सिंग फेडरेशन (आईएबीएफ) के साथ पंजाब सरकार को कई खत लिखे, लेकिन किसी ने कभी कोई प्रतिक्रिया नहीं दी।' कांपती आवाज में उन्होंने आगे कहा, 'मैं जो टैक्सी चला रहा हूं वह भी मेरी नहीं है। कोई मेरी बात सुनने को तैयार नहीं है।'