दलाई लामा से क्यों चिढ़ता है चीन?

नई दिल्ली ( 4 अप्रैल ): तिब्बती धर्मगुरु 14वें दलाई लामा दुनिया में कहीं किसी से भी मिलने जाएं या उनसे कोई मिलने जाए, तो चीन आग बबूला हो जाता है। चीन दलाई लामा को एक अलगाववादी नेता मानते हुए उन्‍हें देश के लिए खतरा बताता है। वह हमेशा दूसरे देशों पर 'वन चाइना पॉलिसी' के तहत दलाई लामा का स्‍वागत न करने का दबाव डालता है। चीन दलाई लामा को अलगाववादी मानता है। उसका आरोप है कि वे तिब्बत को चीन से अलग करना चाहते हैं।


आप यह जानकर भी हैरान हो जाएंगे कि शांति का नोबेल पुरस्‍कार जीतने वाले दलाई लामा 62 में चीन और भारत के बीच हुई जंग की वजह में से ही एक वजह थे। आइए आज हम आपको बताते हैं कि दलाई लामा कौन हैं और क्‍यों वह हमेशा चीन के गले में फांस की तरह से चुभते आए हैं।


दलाई लामा का जन्‍म नार्थ तिब्‍बत के आमदो स्थित एक गांव जिसे तकछेर कहते हैं, वहां पर छह जुलाई 1935 को हुआ था। दलाई लामा का असली नाम ल्‍हामो दोंडुब है। इनकी उम्र जब सिर्फ दो वर्ष थी तो इसे 13वें दलाई लामा थुबतेन ग्‍यात्‍सो का अवतार माना गया और 14वां दलाई लामा घोषित किया गया।


वर्ष 1949 में चीन ने तिब्‍बत पर हमला किया और इस हमले के एक वर्ष बाद यानी वर्ष 1950 में दलाई लामा से तिब्‍बत की राजनीतिक विरासत को संभालने के लिए अनुरोध किया गया।


चीन तिब्‍बत को अपना हिस्‍सा मानता है। वर्ष 1954 में दलाई लामा चीन के माओ जेडॉन्‍ग और दूसरे चीनी नेताओं के साथ शांति वार्ता के लिए बीजिंग गए। इस ग्रुप में चीन के प्रभावी नेता डेंग जियोपिंग और चाउ एन लाइ भी शामिल थे। वर्ष 1959 में चीन की सेना ने ल्‍हासा में तिब्‍बत के लिए जारी संघर्ष को कुचल दिया। तब से ही दलाई लामा हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला में निर्वासित जिंदगी बिता रहे हैं। धर्मशाला आज तिब्‍बती की राजनीति का सक्रिय केंद्र बन गया है।


दलाई लामा को वर्ष 1989 में शांति के नोबेल पुरस्‍कार से सम्‍मानित किया गया था। अब तक दलाई लामा 62 से भी ज्‍यादा देशों की यात्रा कर चुके हैं और कई देशों के राष्‍ट्राध्‍यक्षों से भी मुलाकात कर चुके हैं। उन्‍हें वर्ष 1959 से लेक‍र अब तक 84 से भी ज्‍यादा सम्‍मान से नवाजा जा चुका है। उन्‍होंने 72 से भी ज्‍यादा किताबें लिखी हैं।


जब चीन ने वर्ष 1959 में इस बात का ऐलान किया था कि वह तिब्‍बत पर कब्‍जा करेगा तो भारत की ओर से एक चिट्ठी भेजी गई थी। भारत ने चीन को तिब्‍बत मुद्दे में हस्‍तक्षेप का प्रस्‍ताव दिया था। चीन उस समय मानता था कि तिब्‍बत में उसके शासन के लिए भारत सबसे बड़ा खतरा बन गया है। वर्ष 1962 में चीन और भारत के बीच युद्ध की यह एक अहम वजह थी।


मार्च 1959 में जब दलाई लामा को सूचना मिली कि चीन की पुलिस उन्हें गिरफ्तार करके बीजिंग ले जाना चाहती है तो वे 1959 में रातों रात अपने सैकड़ों सहयोगियों के साथ भारत आ गए। भारत सरकार ने उन्हें शरण दी। चीन ने भारत से दलाई लामा को लौटाने के लिए कहा, परन्तु पंडित नेहरू इस पर राजी नहीं हुए। तब से चीन और भारत के संबंध बिगड़ते चले गए। चीन ने 1962 में भारत पर एकाएक चढ़ाई कर दी। भारत चीन की इस धोखेबाजी के लिए तैयार नहीं था। परिणाम हुआ कि वह बुरी तरह हार गया।


तिब्बत में अशांति का दौर जारी है। वर्ष 2008 और 2009 में तिब्बत की आजादी के लिए 137 बौध्द लामाओं ने आत्मदाह किया था। यह सिलसिला अभी भी जारी है। भारत और अमरीका ने चीन की सरकार से कई बार कहा है कि वह दलाई लामा के प्रतिनिधियों के साथ बैठकर तिब्बत की समस्या का समाधान करने का प्रयास करे। पिछले कई महीनों में इस तरह की कई बैठकें हुई, परन्तु कोई परिणाम नहीं निकला।


हर बार चीन के प्रतिनिधि ने कहा कि दलाई लामा आतंकवादी हैं। वह भारत में बैठकर तिब्बत की जनता में असंतोष फैला रहे हैं। उन्हें चीन के खिलाफ भड़का रहे हैं। जब दलाई लामा के प्रतिनिधि ने सबूत मांगा तो चीन के प्रतिनिधि बैठक से उठकर चले गए।


चीन के मुताबिक तिब्बत की समस्या का समाधान तभी होगा जब वर्तमान दलाई लामा की मृत्यु हो जाएगी और उनकी जगह चीन की सरकार द्वारा नियुक्त कोई नया दलाई लामा आएगा। इस बात से तिब्बत की जनता में भारी रोष है।


चीन का मानना है कि दलाई लामा ने तो उसी समय धर्मगुरु की अपनी हैसियत गंवा दी थी, जब वह देश छोड़कर भागे थे और लोगों के साथ विश्वासघात किया था। यदि दलाई लामा लौटना चाहते हैं, तो उन्हें तिब्बत की आजादी का राग छोड़ना पड़ेगा। सार्वजनिक तौर पर यह कबूल करना होगा कि तिब्बत व ताईवान चीन का अभिन्न हिस्सा हैं और पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना ही वैध हुकूमत है। चीन ने अपने सैलानियों को भी चेतावनी दी हुई है कि वे दलाई लामा से दूर रहें।