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दिल्ली में कूड़े-कचरे से नहीं बन रहा एक फीसद भी खाद

राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली का पूर्वी हिस्सा, जिसे आम बोलचाल में दिल्ली का यमुनापार इलाका कहा जाता है। उसी यमुनापार के त्रिलोक पुरी में सुबह-सुबह पूर्वी नगर निगम के कर्मचारी घरों से कूड़ा उठाने का काम कर रहे हैं।

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कुंदन सिंह, न्यूज 24 ब्यूरो, नई दिल्ली(17 अक्टूबर): राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली का पूर्वी हिस्सा, जिसे आम बोलचाल में दिल्ली का यमुनापार इलाका कहा जाता है। उसी यमुनापार के त्रिलोक पुरी में सुबह-सुबह पूर्वी नगर निगम के कर्मचारी घरों से कूड़ा उठाने का काम कर रहे हैं। नगर निगम ने प्रयोग के तौर पर पहली बार प्रत्येक घरों में सूखे और गिले कचड़े के प्रबंधन के लिए दो दो डब्बें मुहैया कराया हैं, जिसकी वजह से यहां के लोग सूखा और गिला कूड़ा अलग अलग दे रहे हैं। नगर निगम के कर्मचारी गीला कचरा को इकट्ठा कर सीधे कम्पोस्ट यूनिट में खाद बनाने के लिए भेज देते हैं। वहीं, सूखे कचरा को लैड फिल्ड में भेजा जाता है। ये काम पहले नहीं होता था सारा का सारा कचरा सीधे लैंडफिल में चला जाता था।

त्रिलोक पुरी में चलाये जा रहे इस अभियान को एमसीडी ने स्वच्छ गली का नाम दिया है पर ये एक पॉयलट प्रोजेक्ट के तौर पर चल रहा हैं। पूरी दिल्ली के गीले कचरा से खाद यानी कम्पोस्ट बन पाये ये दूर की कौड़ी है। आंकड़ों की बात करें तो कुल कूड़े का 1 फीसदी भी कूड़े का कम्पोस्ट नहीं बन रहा है पर इसकी शुरुआत जरुर हो गई है पूर्वी दिल्ली में 10 टन कूड़े की यूनिट जरूर शुरु हुआ है। पूरे दिल्ली में ईस्ट एमसीडी के अलावा बाकी नगर निगमों के द्वारा भी इस तरह के पॉयलट प्रोजेक्ट चलाया जा रहा हैं, जिसमें कचरे को सोर्स पर ही सेगरीगेट यानी छटनी कर के अलग अलग यूनिट में रिसाइकील के लिए भेज दिया जाता है। दिल्ली में काम कर रही कुल पांचों नगर निगमों की बात कर ले तो कुल कूड़े को 5 फिसदी भी नहीं है।

पर ये सभी प्रयास ऊंट के मुंह में जीरा के बराबर हैं, क्योंकी समस्या इससे बहुत बड़ी है। दिल्ली  दुनिया भर के प्रदूषित शहरों में अव्वल क्यों है। इस आकड़े को समझते हैं, उससे पहले समझना जरूरी हैं की आसपास जो कचरा निकलता है वो कौन-कौन से कई प्रकार का होता है। साथ ही ये की कौन से कचरे को कौन सी संस्थाएं उसका निपटारा करती हैं। सबसे पहले बात घरों से निकलने वाले सॉलिड वेस्ट की जिसे मोटे तौर पर हम दो कैटेगरी में बांटता है।

 

दिल्ली में कचड़े के प्रबंधन में लगी एजेंसियां की बात करे को मोटे तौर पर 3 एजेंसीयॉ इस काम को करती हैं। सबसे पहले बात सोलिड वेस्ट की बात करे जिसमें दिल्ली की तीन नार्थ, साउथ और ईस्ट एमसीडी के अलावा एनडीएमसी और दिल्ली कॉन्टोमेंट बोर्ड पुरे शहर के निकलने वाले कूड़े को इकट्ठा करने के लिए प्रबंधन करती है। इसके साथ ही केंद्र सरकार की संस्था सेंट्रल पॉलुशन कंट्रोल बोर्ड और दिल्ली सरकार का शहरी विकास मंत्रालय बाकी के कुड़े के निपटारे की मॉनिटरींग करती हैं वही रोजाना पुरी दिल्ली की बात करे तो रोजाना 10 से 11 हजार टन सोलिड वेस्ट रोजाना निकलता है। जिसका ना मात्र ही प्रबंधन यानी कम्पोंट या फिर रीसाइकिल यूनिट में जा पाता हैं। दिल्ली में सोलिड वेस्ट मैनेंजमेंट की बात करे उसके प्रबंधन और रीसाइकिल के लिए कुछ प्रयास जरुर हो रहे है पर उसकी मात्रा बहुत कम हैं। उसमें सबसे पहला प्रयास सोलिड वेस्ट के गिले कचड़े को कम्पोस्ट करना। पूर्वी दिल्ली में 5 यूनिट लगाई गई हैं, जिसमें रोजाना एक टन गीले कचड़े को कम्पोस्ट में तब्दील की जा रही है।

वहीं इसके अलावा वेस्ट टू एनर्जी कार्यक्रम के तहत सूखा कचड़ा जलाकर बिजली पैदा करने की यूनिट चलाई जा रही हैं। मौजूदा समय में 3 यूनिट कचरा के बिजली बनाने का काम हो रहा हैं। दिल्ली में गाजिपुर, ओखला और बुराड़ी में कुल 50 मेगावाट बिजली पैदा की जाती है। वहीं करीब 1000 टन कूड़े को इसके सहारे रिसाइकिल किया जाता है। पूर्वी दिल्ली नगर निगम में बतौर चीफ इंजीनियर प्रदीप कुमार खंडेलवाल जिनकी जिम्मेंदारी कूड़े के प्रबंधन की है। उनका मानना है की जबतक कूड़े का निस्तारण के साथ ही पहले से लैंड फिल्ड में जमे कूड़े के पहाड़ को नहीं हटाया जायेगा तब तक हालात समान्य नहीं होगा। खंड़ेलवाल मानते है की सबसे बड़ी चुनौति गाजीपुर लैंड फिल पर जमे कुड़े 1 लाख 40 हजार टन कचड़े का प्रबंधन कैसे करे। इस कचड़े के पहाड़ को सड़क बनाने के लिए प्रयोग में लाने के लिए सड़क परिवहन विभाग से बात चली थी लेकिन बात सरकारी फाइलो में अटक कर रह गई।

सोलिड वेस्ट के बाद बारी आती हैं शहरो में नये निर्माण के लिए पुराने कंसट्रक्शन और डेमोलिशन को तोड़ने से निकला बिल्डिंग मैटेरीयल का कचड़ा तो की पहले से जमें लैड फिल्ड में सबसे बड़ी चुनौती बनकर उभर रहा है। हालांकि अब इसके प्रबंधन के लिए इनका सैगरीगेशन और रिसाइकिल प्लॉट जरूर शुरू किया हैं। दिल्ली की जनसंख्या करीब पौने 2 करोड़ हो चुकी  है। मौजूदा आंकड़ों में राजधानी प्रतिदिन लगभग 10 से 11हजार टन कचरा उत्पन्न करती है, जिसमें से 80% करीब नगरपालिका के द्वारा नियंत्रित और निगरानी की जाने वाली विभिन्न लैंडफिल साइटों पर फेंक दिया जाता है।

ओखला, भलस्वा और गाजीपुर लैंडफिल साइटें अपनी अधिकतम क्षमता से अधिक भरी गई हैं। सरकार द्वारा निर्धारित नियमों के मुताबिक लैंडफिल की ऊँचाई 25 मीटर तक होनी चाहिए, लेकिन दिल्ली में हर लैंडफिल साइट जमीन के स्तर से लगभग 50 मीटर ऊपर है। दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति (डीपीसीसी) के अनुसार लैंडफिल अब चालू नहीं हैं। दिल्ली में 30 सीवेज उपचार संयंत्र (एसटीपी) शहर की आबादी के केवल 45% हिस्से के कचरे का निपटान करता है। 

पड़ोसी राज्यों से शहर में आने वाली आबादी के प्रवेश के कारण शहर की सीमाओं का विस्तार हो रहा है। झोपड़ियां और जे जे समूह और अनधिकृत कलोनियां भी सीवेज उपचार संयंत्र से जुड़ी हुई हैं। दिल्ली में मौजूद 30 एसटीपी अपनी पूरी क्षमता पर काम नहीं कर रहे हैं, क्योंकि संयंत्र की अधिकांश पाइप लाइनें बंद है, दशकों पुरानी और खराब है। दिल्ली के बढ़ते विस्तार के कारण यमुना नदी प्रदूषित हो रही है। नदी के प्रदूषण का 85% जिम्मेदार दिल्ली शहर है, जिसने नदी को विलुप्त होने के कगार पर पहुँचा दिया है। ऐसे में बात पॉयलट प्रोजेक्ट से आने जाना होगा।

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