इस कॉलेज हॉस्टल में महीने में दो बार मिलता है 'नॉन-वेज', पर खाने के लिए...

नई दिल्ली (23 मई): कर्नाटक में एक सरकारी मेडिकल इंस्टीट्यूट है जिसका नाम है- हसन इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेस। शुक्रवार शाम को यहां कई स्टू़डेंट्स को हॉस्टल डाइनिंग रूम से बाहर नॉन-वेज खाना खाते देखा गया। उन्हें चिकन करी और राइस परोसा गया था। आप सोच रहे होंगे इसमें खास बात क्या है?

दरअसल, यहां जब भी नॉनवेज खाना हॉस्टल में परोसा जाता है तो स्टूडेंट्स हॉस्टल बिल्डिंग के बाहर जाकर ही इसे खाते हैं। कभी भी बिल्डिंग के अंदर नहीं।

'द हिंदू' की रिपोर्ट के मुताबिक, जब भी हॉस्टल में नॉन वेज खाना पकाया जाता है। फूड कन्टेनर्स को किचन के बाहर रख दिया जाता है। स्टूडेंट्स इसे अपनी प्लेट्स में परोसते हैं और खाने के लिए खुले में लॉन्स में चले जाते हैं।

एक स्टूडेंट ने नाम का खुलासा ना करने की शर्त पर बताया कि यहां ऐसा उसके आने से पहले से हो रहा है। उसके सीनियर्स भी ऐसा करते थे, अब जूनियर्स भी ऐसा करते हैं। उसने बताया कि वे कभी इसके लिए सवाल नहीं उठाते। हालांकि, ऐसा कॉलेज के नियमों में कहीं पर भी ऐसा लिखित रूप में निर्देश नहीं है। 

हसन इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेस के हॉस्टल में करीब 250 स्टूडेंट्स रहते हैं। जिनमें से नॉन वेज खाने वाले 150 लोग हैं। नॉन वेज फूड हॉस्टल में महीने में केवल दो बार ही पकाया जाता है। हॉस्टल मेस का संचालन स्टूडेंट्स के प्रतिनिधियों की एक समिति करती है। हॉस्टल वॉर्डन भी हॉस्टल मेस की देखरेख करती है।

वेज और नॉन-वेज खाना बनता एक ही किचन में है। लेकिन इसे कभी भी डाइनिंग हॉल में सर्व नहीं किया जाता। एक स्टूडेंट ने कहा कि हो सकता है कि सीनियर्स ने नॉन वेज बाहर खाना शुरू कर दिया हो जिससे शाकाहारियों को दिक्कत ना हो। अभी तक इस अलगाव को लेकर कोई परेशानी नहीं हुई है। हालांकि, रिपोर्ट के मुताबिक, कुछ छात्रों को यह अनुचित लगता है। 

बायो-कैमिस्ट्री के एसोसिएट प्रोफेसर और हॉस्टल वॉर्डन कन्ताइया ने बताया कि स्टूडेंट्स खुद से ही बाहर खाते हैं। इंस्टीट्यूशन की तरफ से कोई भी ऐसा निर्देश नहीं दिया गया है।