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शहाबुद्दीन के मामले में बिहार सरकार गंभीर नहीं!

प्रभाकर मिश्रा, नई दिल्ली (28 सितंबर): शहाबुद्दीन की जमानत रद्द करने वाली याचिकाओं पर सुनवाई हुई। चंदा बाबू यानि पीड़ित परिवार की ओर से प्रशांत भूषण और बिहार सरकार से सीनियर एडवोकेट दिनेश द्विवेदी ने अपनी अपनी दलीलें रखीं।  प्रशांत भूषण ने 'साहेब' के हिस्ट्री शीटर होने, नोटोरियस क्रिमिनल साबित करने और जेल से बाहर होने की सूरत में किस तरह तेज़ाबकाण्ड से जुड़े लोगों गवाहों के जान को खतरा है, साबित करने की कोशिश की। कोर्ट ने ध्यान पूर्वक सुना।

लेकिन जब बारी बिहार सरकार के वकील की आई, स्थिति बदल गई। बिहार सरकार के वकील ने दलील दी 'माई लॉर्ड्स, हाईकोर्ट ने केवल ट्रायल में डिले को ग्राउंड मानकर जमानत दी है, जो न्यायसंगत नहीं है। सुप्रीम कोर्ट के कई फैसले हैं, जिसके मुताबिक केवल यह आधार नहीं हो सकता। मसलन आरोपी का पास्ट रिकॉर्ड, हिस्ट्री शीटर होना, अपराध की गभीरता ये सब भी देखना होता।'

फिर क्या था... जस्टिस घोष और जस्टिस रॉय दोनों ने बारी-बारी से सवालों की झड़ी लगा दी। हाईकोर्ट में सरकार ने इस डिले ग्राउंड का विरोध क्यों नहीं किया। सहाबुद्दीन को और कई मामलों में जमानत मिली है, इस मामले में खास (peculiarity) क्या है। बाकी मामलों में जमानत को चुनौती क्यों नहीं दी गई। किसके कहने पर नहीं दी गई।

ये सवाल ऐसे थे जिनका जवाब बिहार सरकार के लिए नवनियुक्त वकील दिनेश द्विवेदी के पास नहीं थे। उनको मानना पड़ा की सरकार से चूक हुई है। सुनवाई गुरुवार को भी जारी रहेगी जब शहाबुद्दीन के वकील शेखर नाफड़े अपनी दलील पेश करेंगे कि क्यों नहीं जम्मानत रद्द होना चाहिए। एक बात और रामजेठमलानी ने शहाबुद्दीन को भरोसा दिलाया था की उनकी पैरवी करेंगे, लेकिन शायद लालू के वकील राम जेठमलानी ने सोचा लालू तक तो ठीक है शहाबुद्दीन नहीं।


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