आम चुनाव: रूठा है मना लेंगे...गठबंधन की घोषित जरूरतों पर एक अघोषित मतभेद




न्यूज 24 ब्यूरो, उत्कर्ष अवस्थी, नई दिल्ली (19 फरवरी): दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है भारत। सवा सौ करोड़ वाले इस देश में लोकतंत्र के उत्सव यानि आम लोकसभा चुनाव में 100 दिनों से भी कम का वक़्त बचा है। अब जब चुनाव सिर पर हैं तो राजनितिक पार्टियां अपने सारे पैंतरे आजमा लेने को बेताब हैं। विश्व की सबसे बड़ी राजनितिक पार्टी 'भारतीय जनता पार्टी' इस आम चुनावों में हर कीमत पर अपनी सरकार बचाना चाहती है। एक शेर है, "मोहब्बत आजमानी हो तो बस इतना ही काफी है, जरा सा रूठ कर देखो मनाने कौन आता हैँ'", इस शेर का जिक्र यहां पर इस लिए जरुरी था क्यूंकि बीजेपी को भले दलों ने साढ़े चार साल पानी पी-पी कर कोसा हो मगर चुनाव आते ही सबकी नाराज़गी बीजेपी ने दूर करनी शुरू कर दी है। 






आगमी लोकसभा चुनाव से पहले गठबंधनों के बनने और बिगड़ने का दौर अपने चरम पर है। कल ही बीजेपी और शिवसेना ने महाराष्ट्र में गठबंधन का ऐलान किया है। वहीँ आज तमिलनाडु में बीजेपी और AIADMK में गठबंधन हो गया। दरअसल यह लड़ाई यूपीए बनाम एनडीए की है। एक ओर यूपीए हैं जो अपने गठबंधन को अंतिम रूप अबतक नहीं दे पाया है। तो वहीं दूसरी ओर बीजेपी है जो गठबंधन बनाने के अंतिम दौर में है। इस अवसरवादी चुनावी गठबंधन में बीजेपी ने अपने तीन सबसे बड़े सहयोगियों जेडीयू और शिवसेना और एआईएडीएमके से गठबंधन का गणित तय कर लिया है। बिहार में जहां एनडीए में नीतीश कुमार की जेडीयू और राम विलास पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी शामिल है।






अब बात लोकसभा सीटों के लिहाज से देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश की करते हैं। यूपी में अपना दल और सुहेलदेव समाज पार्टी के साथ बीजेपी गठबंधन में है। लेकिन यहां अभी तक सीटों पर फैसला नहीं हो पाया है।  सुहेलदेव समाजपार्टी के नेता और राज्य सरकार में मंत्री ओम प्रकाश राजभर रोज नया बयान देकर गठबंधन में मुश्किल खड़ी करते नजर आ रहे हैं। कुछ यही हाल केंद्रीय मंत्री और अपना दल नेता अनुप्रिया पटेल का है। बीजेपी के चाणक्य कहे जाने वाले राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह इनकी नाराज़गी दूर करने के लिए क्या कदम उठाते हैं वो गौर करने लायक बात होगी। 






जबकि पंजाब में बीजेपी का अकाली दल के साथ गठबंधन करीब-करीब तय है। एनडीए को राज्यवार देखे तो वर्तमान में करीब 40 पार्टियां इसका हिस्सा है। बीजेपी सबके लिए लोकसभा में सीटें छोड़ेगी ऐसा कहना मुश्किल है, क्योंकि 40 दलों के इस आंकड़े में कुछ राजनीतिक दल तो ऐसे हैं जो अपने राज्य में एक या दो विधानसभा सीट ही जीत सके है. लेकिन राज्य में सरकार चलाने के लिए उनका साथ रहना जरूरी है। 





एक और राज्य ओडिशा में भी पार्टी अकेले चुनाव लड़ने में फायदा देख रही है। हिमाचल प्रदेश, मध्य प्रदेश ,जम्मू कश्मीर, राजस्थान, उत्तराखंड, दिल्ली ये ऐसे राज्य हैं जहां बीजेपी को किसी के साथ की जरुरत ही नहीं है। यहाँ बीजेपी अकेले दम पर चुनाव लड़ने का देख रही है। वहीँ हरियाणा में अकाली दल, त्रिपुरा में आईपीएफटी, पुड्डुचेरी में एआईएनआर कांग्रेस, गोवा में एमजीपी और जीएफपी, कर्नाटक में केपीजे, मणिपुर में एनपीएफ, एनपीपी, लोकजनशक्ति पार्टी, अरुणाचल प्रदेश में एनपीपी, असम में बीपीएफ ऐसे सहयोगी दल है, जिन्‍हें बीजेपी लोकसभा चुनाव में कोई सीट नहीं देना चाहेगी। 





जरा पीछे चलते हैं, अगर आपको याद हो तो 2014 लोकसभा चुनाव की तो उस समय एनडीए में कुल तीस दल थे। इनमें पांच दलों के लिए बीजेपी ने कोई सीट नहीं छोड़ी थी। बीजेपी 2014 में लोकसभा की कुल 543 में 426 सीटों पर चुनाव लड़ी थी। पार्टी ने आंध्र प्रदेश में 30 सीटें टीडीपी के लिए छोड़ी थी यानी गठबंधन में सबसे ज्यादा सीटें।






महाराष्ट्र में शिवसेना के लिए 20 और छोटे सहयोगी दलों के लिए चार सीटें छोड़ी थी। बिहार में रामविलास पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी के लिए सात और उपेंद्र कुशवाहा की लोकसमता पार्टी के लिए तीन सीटें छोड़ी थी। चुनाव परिणामों के बाद 18 सीटें जीतकर शिवसेना सबसे बड़ा सहयोगी दल हो गया, जबकि 16 सीटें जीतकर टीडीपी दूसरे नंबर का सहयोगी दल रहा था। बात करें गठबंधन की संख्या की, तो तमिलनाडु में 2014 में बीजेपी ने डीएमडीके, पीएमके, एमडीएमके, केएमडीके, एनजेपी, आईजेके जैसे 6 दलों के साथ मिलकर गठबंधन बनाया, लेकिन परिणामों पर उसका कोई असर नहीं पड़ा।





वहीँ तमिलनाडु के बाद बीजेपी के पास सबसे ज्यादा सहयोगी दल महाराष्ट्र में थे। पार्टी ने यहां शिवसेना का साथ-साथ आरपीआई, स्वाभिमान पक्ष, राष्ट्रीय समाज पक्ष के लिए भी सीटें छोड़ी थी।  बिहार में 2014 के चुनाव में पार्टी का साथ देने वाले उपेंद्र कुशवाहा इस बार विपक्ष में है, जबकि 2014 के चुनाव में सबसे बड़ी चुनौती नीतीश कुमार इस बार एनडीए का झंडा बुलंद कर रहे हैं। बिहार में जहां उपेंद्र कुशवाहा ने एनडीए का साथ छोड़ा, तो पार्टी ने अपने सबसे पूराने साथियों में एक रहे नीतीश कुमार को अपने साथ कर लिया है। 





"वक्त कम है साथ बिताने के लिए इसको ना गंवाना रूठने मानाने के लिए।" साफ है 2014 से 2019 आते-आते सहयोगियों से भले ही बीजेपी के रिश्ते खट्टे मीठे रहे हों, लेकिन आम चुनावों से पहले पार्टी ने शिवसेना को साथ लाकर साफ कर दिया है कि एनडीए का कुनबा छोटा नहीं होगा। आंध्र प्रदेश में भले ही टीडीपी का साथ छूट गया हो, लेकिन तमिलनाडु में एआईएडीएमके के साथ एनडीए में उसकी कमी पूरी करेगा। पिछले पांच सालों में एनडीए में उत्तर पूर्व में कई छोटे दल शामिल हुए हैं, जिनसे लोकसभा सीटों की संख्या पर मोलभाव जारी है यानी 2019 के चुनाव में एनडीए का कुनबा 2014 से बड़ा होगा। 






ये चुनाव यूपीए बनाम एनडीए तो है ही मगर ये चुनाव है चार साल की नाराज़गी को अपनेपन में बदलने का है। ये चुनाव दुश्मनी को दोस्ती में तब्दील करने का है। ये लोकसभा चुनाव सत्ता बचाने बनाम सत्ता में वापसी का है। ये चुनाव नेताओं की शान, पहचान, का तो है ही है मगर ये चुनाव सबसे महतवपूर्ण हिंदुस्तान की सवा सौ करोड़ जनता का है। 





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