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जाते-जाते साइरस ने फोड़ा एक और 'बम'

नई दिल्ली(27 अक्टूबर): टाटा उद्योग समूह के चेयरमैन पद से अचानक हटाये जाने से आहत साइरस मिस्त्री ने रतन टाटा के खिलाफ कई आरोप लगाए हैं और कहा है कि कंपनी में उन्हें 'एक निरीह चेयरमैन' की स्थिति में ढकेल दिया गया था। एक गोपनीय लेकिन विस्फोटक मेल में मिस्त्री ने टाटा नैनो कार को भी लेकर अहम खुलासे किए हैं। टाटा और अपने बीच बेहतर संबंध नहीं होने का स्पष्ट संकेत देते हुए उन्होंने अपने ईमेल में रतन टाटा द्वारा शुरू की गई घाटे वाली नैनो कार परियोजना का मुद्दा भी उठाया है।

उन्हेंने कहा कहा कि इसे भावनात्मक कारणों से बंद नहीं किया जा सका। एक कारण यह भी था कि इसे बंद करने से बिजली की कार बनाने वाली एक इकाई को 'सूक्ष्म ग्लाइडर' की आपूर्ति बंद हो जाती। उस इकाई में टाटा की हिस्सेदारी है। मिस्त्री ने आरोप लगाया है कि यह रतन टाटा ही थे जिन्होंने समूह को विमानन क्षेत्र में कदम रखने को मजबूर किया था और उनके लिए (मिस्त्री के लिए) एयर एशिया और सिंगापुर एयरलाइंस के साथ हाथ मिलाना एक औपचारिकता मात्र बची थी।

साइरस मिस्त्री ने टाटा समूह पर आरोपों की झड़ी लगा दी है। उन्होंने मेल में कहा कि निर्णय प्रक्रिया में बदलाव से टाटा समूह में कई वैकल्पिक शक्ति केंद्र बन गए थे। उन्होंने आरोप लगाया कि उन्हें अपनी बात रखने का कोई मौका दिए बिना ही भारत के सबसे बडे औद्योगिक समूह के चेयरमैन पद से हटाया गया। मिस्त्री का कहना है कि उनके खिलाफ यह कार्रवाई 'चटपट अंदाज' में की गई। उन्हेंने इसे कॉर्पोरेट जगत के इतिहास की अनूठी घटना बताया।

मिस्त्री ने 25 अक्टूबर को लिखे ई-मेल में कहा, '24 अक्टूबर 2016 को निदेशक मंडल की बैठक में जो कुछ हुआ, वह हतप्रभ करने वाला था और उससे मैं अवाक रह गया। वहां की कार्रवाई के अवैध और कानून के विपरीत होने के बारे में बताने के अलावा, मुझे यह कहना है कि इससे निदेशक मंडल की प्रतिष्ठा में कोई वृद्धि नहीं हुई।' मीडिया को जारी इस ई-मेल में उन्होंने लिखा है, 'अपने चेयरमैन को बिना स्पष्टीकरण और स्वयं के बचाव के लिये कोई अवसर दिये बिना चटपट कार्रवाई में हटाना कॉर्पोरेट इतिहास में अनूठा मामला है।'

मिस्त्री के आरोपों के बारे में टाटा संस से जवाब लेने का प्रयास किया गया लेकिन उनकी तरफ से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई। टाटा समूह के पूर्व प्रमुख ने कहा कि उन्हें दिसंबर 2012 में जब नियुक्त किया गया था, उन्हें काम करने में आजादी देने का वादा किया गया था लेकिन कंपनी के संविधान में संशोधन, टाटा परिवार ट्रस्ट और टाटा संस के निदेशक मंडल के बीच संवाद सम्पर्क के नियम बदल दिए गए थे।  


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