मिलिए, कश्मीर की पहली महिला फुटबॉल कोच नादिया से

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न्यूज 24 ब्यूरो, नई दिल्ली (18 दिसंबर): हमारे देश में आजादी के बाद से ही लड़कियों और महिलाओं के लिए एक धराणा बनी आ रही है कि देश की महिलाएं और लड़किया कोई बड़ा काम नहीं कर सकती। लेकिन अब समय पूरी तरकी से बदल चुका है। हमारे देश की महिलाएं लगातार पुरुषों के साथ न सिर्फ बराबरी पर खड़ी हैं बल्कि उनसे आगे निकलने का भी माद्दा रखती हैं। इस की एक बानगी जम्मू-कश्मीर में देखने को मिली। जी हां, आपको बता दें कि नादिया निगहत के लिए पहली महिला फुटबॉल कोच बनना कोई आसान काम नहीं था। जम्मू कश्मीर में किसी महिला के लिए ऐसा करना वास्तव में लोगों के माइंडसेट को बदलना था। उन्हें यह बताना था कि लड़कियां किसी भी फील्ड में आगे बढ़ सकती हैं।


कश्मीर के श्रीनगर में रहने वाली 20 वर्षीय निगहत को यह करियर चुनने के लिए बहुत सी आलोचनाओं का सामना करना पड़ा। अपने इस सफर के बारे में नादिया कहती हैं कि 40-50 लड़कों के बीच मैं अकेली लड़की थी, जिसने स्थानीय कालेज में प्रैक्टिस सेशन में भाग लिया। मुझे और मेरे परिवार को इसके लिए कड़ी आलोचना झेलनी पड़ी।


अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए नादिया ने कहा कि 'शुरू में मेरा परिवार भी इसके खिलाफ था कि मैं लड़कों के साथ फुटबॉल खेलूं। लेकिन बाद में मेरे परिवार ने मुझे सपोर्ट किया खासतौर पर पिता ने। बाद में मेरा पूरा परिवार ही मेरा साथ खड़ा रहा।'  पुर्तगाल के फुटबॉल स्टार क्रिस्टियानो रोनाल्डो और अर्जेंटीना के लियोनल मेसी की जबरदस्त फैन नादिया की फुटबॉल में स्कूल के समय से ही गहरी रुचि रही। नादिया अमर सिंह कालेज अकादमी फुटबॉल की बारीकियां सीखने गईँ। 


बाद में जम्मू कश्मीर फुटबॉल एसोसिएशन ने नादिया की इस बात के लिए मदद की कि वह फुटबॉल में अपना करियर बना सकें। घाटी में खराब हालात पर बात करते हुए नादिया कहती हैं, 'जब भी हमारे क्षेत्र में कर्फ्यू लगता है, तब भी मैं अपना ट्रेनिंग सेशन किसी तरह पूरा करती हूं। इस तरह की परिस्थितिय़ों में अपने सपने को पूरा करना आसान नहीं है। लेकिन यदि आपके भीतर समर्पण है तो रास्ते बनते चले जाते हैँ।'


गौरतलब है कि नादिया फिलहाल महाराष्ट्र, ठाणे के एक स्कूल में बच्चों को फुटबॉल का प्रशिक्षण देती हैं। उन्होंने अभिभावकों से यह अपील की है कि वे अपनी बेटियों को फुटबॉल सीखने के लिए भेजें। वह नहीं मानतीं कि फुटबॉल लड़कों का खेल है।