'मुस्लिम महिलाएं परंपरागत तलाक़ प्रथा के खिलाफ'

नई दिल्ली (27अप्रैल): राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखबार ने लिखा है कि लगभग 80 फीसदी मुस्लिम महिलाएं एकतरफा तलाक का शिकार होती हैं। इनमें से 65 फीसदी से ज्यादा को तो सिर्फ बोलकर तलाक दे दिया जाता है। अखबार ने लिखा है कि ज्यादातर काज़ियों की पहचान मुकम्मल करवाना चाहती हैं। कुछ प्रगतिशील मुस्लिम महिलाओं ने तीन बार तलाक बोल कर शादी खत्म करने की परंपरा को उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी है।  

अखबार में उत्तराखंड की सायरा बानो का उदाहरण दिया गया है। सायरा ने  तीन बार तलाक प्रथा को बंद करने के लिए उच्चतम न्यायालय में याचिका दाखिल की है। सायरा को 13 वर्ष के वैवाहिक जीवन के बाद ऐसे ही तलाक का सामना करना पड़ा था। इसके बाद सायरा ने उच्चतम न्यायालय में गुहार लगाई कि तीन तलाक की इस एक तरफा प्रथा पर पुनर्विचार किया जाए। न्यायालय ने सायरा की याचिका पर संज्ञान लिया है। अखिल भारतीय मुसलिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने सायरा की याचिका को चुनौती दी है। उनकी याचिका में कहा गया है कि तीन तलाक की प्रथा घृणित है और संविधान की धारा 51-ए के तहत इससे बतौर भारतीय नागरिक मुस्लिम महिलाओं के मूलभूत अधिकारों का हनन होता है।

 बताया जाता है कि सायरा अपने पति की मर्जी के खिलाफ अपनी मां से मिलने चली गयी। बस इतनी सी बात से नाराज उसके पति ने उसे तीन बार तलाक बोल कर विवाह तोड़ दिया। इसलिए उन्होंने याचिका दाखिल कर अदालत से जानना चाहा कि तीन बार तलाक बोलने की कानूनी वैधता क्या है। साथ ही मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) की कानूनी वैधता क्या है। इसके तहत बहुविवाह, तीन तलाक, निकाल और हलाला की क्या वैधता है। सायरा ने याचिका में कहा कि यह प्रथा महिला और मानवाधिकार विरोधी है। उन्होंने अपने तर्क में कई मुसलमान देशों में मुसलमानों में बहु विवाह प्रथा पर प्रतिबंध लगाने का उदाहरण भी दिया।