'बेटों की मर्ज़ी के बिना उनका ख़तना नहीं करा सकता पिता'

नई दिल्ली (19 अप्रैल): इंग्लैंड में एक मुस्लिम शख्स अपने बेटों का खतना करवाना चाहता था। लेकिन वह हाईकोर्ट के जज को मनाने में नाकामयाब रहा। ऐसी स्थिति में हाईकोर्ट ने कहा कि इसका फैसला बेटों पर ही छोड़ दिया जाए, जो बड़े होकर खुद अपनी मर्जी से अपने लिए उचित फैसला करेंगे।

ब्रिटिश अखबार 'द इंडिपेंडेंट' की रिपोर्ट के मुताबिक, जिस मुस्लिम शख्स ने यह मांग रखी थी उसका जन्म अल्जीरिया में हुआ था। लेकिनअब इंग्लैंड में रहता है। शख्स ने तर्क दिया कि खतना मुस्लिम अभ्यासों और धार्मिक आस्था के अनुरूप किया जाना चाहिए क्योंकि ऐसा उसके बेटों की बेहतरी और हित के लिए जरूरी है। लेकिन इस बात से बेटों की मां असहमत थी। डेवन में पली बड़ी महिला अपने बेटों के पिता से अलग हो गई थी। 

जस्टिस श्रीमती रॉबर्ट्स ने डेवन के एक्सीटर के फैमिली कोर्ट में बहस का विश्लेषण करने के बाद खतना किए जाने का आदेश देने से मना कर दिया। उन्होंने कहा, यह फैसला बड़े होने पर लड़कों पर ही छोड़ दिया जाना चाहिए, जो अभी 4 और 6 साल के हैं। जिससे वे एक ऐसी अवस्था में हों जब वे इस बारे में खुद ही व्यक्तिगत निर्णय ले सकें।

पिता की दलील थी, "यह बच्चों के बेहतर हित के लिए जरूरी है। इसलिए उन्हें खतना के लिए मंजूरी दी जाए। जो मुस्लिम अभ्यास और धार्मिक आस्था के अनुरूप हों।" जज ने बताया, "शख्स की पूर्व पत्नी इसके खिलाफ थी। जिससे बच्चे एक ऐसी उम्र में पहुंचकर खुद इसका फैसला कर सकें। तब वे इस प्रक्रिया के लिए खुद ही फैसला कर सकेंगे।"

जस्टिस रॉबर्ट्स ने कहा, "वह एक समर्पित मुस्लिम है। वह इसके सिद्धांत के लिए प्रतिबद्ध है। इसी विरासत के हिस्से के तौर पर वह चाहता है, कि उसके दोनों बेटे मुस्लिमों के तौर पर ही बड़े हों और इसके रीति-रिवाजों का पालन करें। खतना करवाने और इसके कारणों के लिए केवल पिता ही काफी उत्साहित है। इसी समय मां पूरी तरह से इसके खिलाफ है।"

जज ने कहा कि वह एक साफ नतीजे पर पहुंच चुकी हैं। उन्होंने कहा, "सबसे पहले क्योंकि यह एक अपरिवर्तनीय और सिर्फ एक बार होने वाली प्रक्रिया है। इसकी कोई गारंटी नहीं है कि लड़के मुस्लिम धर्म ही मानना चाहें। भले ही पिता इसके लिए काफी समर्पित हो पर वे अपनी मर्जी रख सकते हैं। वे अभी भी काफी छोटे हैं। इस समय इस बात का अनुमान लगाने का कोई तरीका नहीं है कि पैरेंटल होम्स में आगे आने वाले दिनों में उनपर कैसा असर पड़ेगा। किस तरह से आने वाले सालों में उनपर कैसा प्रभाव होगा।"

जज ने कहा, "इसलिए मैं इस फैसले से असहमत हूं। लड़के जब बड़े होंगे वे खुद ही अपना निजी फैसला करेंगे। तब उनके पास उनके फैसले के परिणामों और असर के बारे मं भी गहराई से पता होगा।"

ऐतिहासिक तौर पर खतना यहूदी और मुस्लिम समुदायों में प्रचलित एक अहम और अनिवार्य प्रथा रही है। ब्रिटेन में भी यह प्रक्रिया आम रही है। 1948 में नेशनल हेल्थ च्वाइसेस की स्थापना से पहले 3 मे से 1 पुरुष इस प्रक्रिया से गुजरता था। हालांकि, अब इस प्रक्रिया में काफी कमी आई है। वर्तमान में करीब 8.5 फीसदी पुरुषों का खतना हुआ है। दूसरे देशों में इसकी दर काफी ज्यादा है। जिसमें अमेरिका में 75.5 फीसदी व्यस्क पुरुष इस प्रक्रिया से गुजरे हैं।