‘सुप्रीम कोर्ट के अधिकार क्षेत्र में नहीं है मुसलिम पर्सनल लॉ'

नई दिल्ली (24 मार्च) : ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने कहा है कि देश के सुप्रीम कोर्ट के अधिकार क्षेत्र में यह नहीं है कि वो समुदाय के पर्सनल लॉ जो कि कुरान पर आधारित है उसकी समीक्षा करे। बोर्ड ने कहा कि पर्सनल लॉ कोई संसद से पास किया हुआ क़ानून नहीं है। बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने मुसलिम पर्सनल लॉ में तीन बार तलाक कह कर वैवाहिक संबंध खत्म करने की प्रथा की क़ानूनी वैधता जांच करने का निर्देश दिया था।

टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक बोर्ड ने अपने वकील एजाज मकबूल के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट में अपना रुख जारी किया। इसमें कहा गया कि विधायिका की और से पारित क़ानून और धर्म से निर्देशित सामाजिक मानदंडों के बीच एक साफ़ रेखा होनी चाहिए। बोर्ड के वकील ने कहा कि मोहम्मडन लॉ की स्थापना मुकद्दस कुरान और इस्लाम के पैगंबर के हदीस से की गई है। साथ ही इसे संविधान के अनुच्छेद 13 के मुताबिक अभिव्यक्ति के दायरे में लागू नहीं किया जा सकता। वकील ने कहा कि मुस्लिमों के पर्सनल लॉ विधायिका की और से पास नहीं किए गए हैं।

बोर्ड की और से दाखिल हलफ़नामे में कहा गया, मुस्लिम पर्सनल लॉ एक सांस्कृतिक विषय है जिसे इस्लाम धर्म से अलग नहीं किया जा सकता। इसलिए इसे अनुच्छेद 25 और 26 के तहत अंत:करण की आज़ादी के मुद्दे को संविधान के अनुच्छेद 29 के साथ पढ़ा जाना चाहिए। बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने खुद से मुसलिम महिलाओं के हक़ों की जांच करने का फैसला किया था।

बोर्ड ने साथ ही एक समान सिविल कोड की उपयोगिता को चुनौती देते हुए कहा कि इससे राष्ट्रीय एकता और अखंडता की कोई गारंटी नहीं है। बोर्ड ने दलील दी कि एक साझी आस्था ईसाई देशों को दो विश्व युद्धों से अलग रखने में नाकाम रही। बोर्ड ने कहा कि इसी तरह हिंदू कोड बिल जातीय भेदभाव को नहीं मिटा सका।