किसानों की हड़ताल खत्म करना फडणवीस की मजबूरी?

विनोद जगदाले, मुंबई (3 जून): महाराष्‍ट्र में 2 दिन से चल रही किसानों की हड़ताल आखिरकार खत्म हो गई। यह हड़ताल खत्म हो इसलिए मुख्यमंत्री फडणवीस ने किसानों की 70% मांगें मान ली। इतिहास में पहली बार किसान हड़ताल पर गए और महज 2 दिन में इस आंदोलन में उनकी बड़ी जीत हुई।


2 महीने पहले ही किसानों ने ऐलान किया था कि वो 1 जून 2017 से हड़ताल पर जाएंगे। तब फडणवीस सरकार ने किसान क्रांति दल में दरार पैदाकर कुछ लोगों को चर्चा के लिए बुलाया। फडणवीस को लगा कि यही असली किसानों के मसीहा है और उन्होंने इनकी मांगे मान ली यानी देने वाला भी खुश और लेनेवाला भी। फडणवीस की तोड़ो और राजकरो की नीति किसानों को नही भाई और निकल पड़े ऐतिहासिक हड़ताल के लिए।


हड़ताल शुरू होने से 1 सप्ताह पहले इटेलीजेंस ब्यूरो ने सरकार को बताया कि किसानों ने हड़ताल की बड़ी तैयारी की है। अगर यह हड़ताल हुई तो सूबे में कानून व्यवस्था की स्थिती बिगड़ सकती है। इसीलिए 30 और 31 मई को सीएम ने कृषी राज्यमंत्री सादभाऊ खोत को चर्चा के लिए आंदोलन का केंद्र रहे पुनताम्बा में भेजा, लेकिन नतीजा कुछ नहीं निकला और किसानों की हड़ताल शुरू हो गई।


हड़ताल 1 जून को शुरू हो रही थी, लेकिन किसानों ने 31 मई से ही हाइवे पर अपनी चेक पोस्ट बनाकर मुंबई को भेजे जाने वाली सब्जी और दूध की सप्लाई रोकी। दोपहर तक महाराष्ट्र के लगभग 80 इलाकों में हड़ताल का असर देखने मिला। सूबे के मुखिया फडणवीस को स्टेट इटेलीजेंस ब्यूरो ने बताया कि राज्य में किसान आंदोलन की आग भड़क रही है और अगर वक़्त रहते इसे रोका नहीं गया तो राज्य सरकार के हाथ जल सकते है। साथ ही अगर कही किसानों पर पुलिस द्वारा गोली चलाई जाती है और उसमें 1 किसान भी मारा जाता है तो राज्य में दंगे भड़क सकते है।


उधर पहले ही दिन पुणे शहर में दूध 80 रुपये लीटर बिकने लगा कालाबाजारियों ने इस हड़ताल का फायदा उठाना शुरू किया। इसीलिए सीएम ने पहले ही दिन आनन-फानन में प्रेस कॉन्फ्रेंस लेकर आरोप लगाया कि यह बहती हुई गंगा में हाथ धोने का प्रयास विपक्ष कर रहा है। राज्य में बढ़ते हालात पर दिल्ली की नज़र महाराष्ट्र पर थी। पार्टी के आला नेताओ ने फडणवीस से राज्य की स्थिति का जायजा लिया। दूसरी तरफ सत्ता में रहकर विपक्ष का काम करने वाली शिवसेना ने पहले ही दिन चेतावनी दी कि अगर किसानों पर लाठियां आप चलाओगे तो आपकी यह मर्दानगी शिवसेना नहीं सहेगी और उसका जवाब देगी।


फडणवीस को समझ आ गया कि अगर किसानों के साथ शिवसैनिक रास्ते पर आ गए तो महाराष्ट्र की उनकी सरकार गिरने में देर नहीं लगती और ऐसे मौके पर टीम बी की भूमिका में एनसीपी भी बीजेपी का साथ नहीं दे सकती। ऐसे में 2 कदम पीछे आने में समझदारी है। हड़ताल के दूसरे दिन भी किसानों का आंदोलन ने उग्र स्वरूप धारण कर लिया। सरकार की तरफ से अन्ना हज़ारे ने भी किसान और सरकार के बीच बातचीत का जरिया बनने की कोशिश की, लेकिन फडणवीस का यह दांव उलटा पड़ा और किसानों ने अन्ना की इस भूमिका का विरोध किया। यह क्या कम था कि एनसीपी सुप्रीमो शरद पवार और शिवसेना पक्ष प्रमुख उद्धव ठाकरे ने प्रेस रिलीज़ के जरिए किसानों के आंदोलन को अपना पूरा समर्थन देते हुए किसानों को कहा कि जबतक पूरी कर्जमाफी नहीं मिलती तबतक आंदोलन किसान भाई जारी रखे।


शाम होते होते किसान क्रांति दल ने पुनताम्बा में बैठक कर 5 से 7 जून तक के अपने उग्र आंदोलन की घोषणा की तो सरकार के पसीने छूट गए, लेकिन इस बैठक में एक राहत की बात थी कि किसान क्रांति दल ने सीएम से बैठक कर चर्चा करने का न्योता स्वीकार कर लिया। किसान क्रांति दल की कमिटी सीएम से मिलने के लिए मुंबई रवाना हुई। पहले मुलाक़ात का समय हड़ताल के तीसरे दिन सुबह 9 बजे का तय किया गया, लेकिन सूबे में बिगड़ते कानून व्यवस्था के हालात देखते हुए देर रात को सीएम के सरकारी आवास वर्षा पर 4 घंटे की बैठक सीएम और किसान क्रांति दल के बीच चली। इस बैठक में बात ना बिगड़े और आंदोलन उग्र ना हो इसलिए सीएम ने आंदोलन कारियो की 70% मांगें मान ली और फिर किसान क्रांति दल ने हड़ताल पीछे लेने की घोषणा की।