मोहम्मद रफी पुण्यतिथि विशेष: जानें उनके ये अनसुने किस्से

नई दिल्ली ( 31 जुलाई ): मोहम्मद रफी की आज पुण्यतिथि है। 24 दिसंबर 1924 को अमृतसर के पास कोटा सुल्तान सिंह में रफी का जन्म हुआ था। हाजी अली मोहम्मद के छह बच्चों में रफी दूसरे नंबर पर थे। उन्हें घर में फीको कहा जाता था। गली में फकीर को गाते सुनकर रफी ने गाना शुरू किया। 1935 में रफी के पिता लाहौर चले आए। वहां भट्टी गेट के नूर मोहल्ला में उन्होंने हजामत का काम शुरू किया। रफी के बड़े भाई के दोस्त अब्दुल हमीद ने रफी की प्रतिभा को पहचाना। उन्होंने ही परिवार को मनाया कि वो रफी को बंबई जाने दें। यह 1942 की बात है। मोहम्मद रफी 31 जूलाई 1980 को दुनिया को अलविदा कह दिया। 

-मोहम्मद रफी का जन्म अमृतसर के पास कोटला सुल्तान में 24 दिसंबर 1924 को हुआ था, इसके बाद उनका परिवार 1932 में लाहौर चला गया।

-लाहौर में अपने होने वाले जीजा की मदद से रफी साहब मुंबई आए, जहां उन्होंने गायकी की ट्रेनिंग लेना शुरू कर दिया। रफी ने अपना पहला गाना श्याम सुंदर की फिल्म 'गांव की गोरी' के लिए गाया। इस गाने को उन्होंने जीएम दुरानी के साथ मिलकर गाया था।

-लोगों का मानना था कि मोहम्मद रफी की आवाज शम्मी कपूर पर सबसे ज्यादा फबती थी। लेकिन मोहम्मद रफी के पसंदीदा एक्टर शम्मी कपूर नहीं बल्कि राजेंद्र कुमार थे जिनको टीवी पर देखते ही रफी मानो खो से जाते थे।

-रफी की गायकी के लिए मोहब्बत को इसी से समझा जा सकता है कि जब भारत-पाकिस्तान का विभाजन हुआ था तब उस समय उनकी पहली पत्नी ने भारत में रुकने से मना कर दिया था। ऐसे में रफी ने यह फैसला किया कि वो अपने पहले प्यार यानी सिंगिंग के खातिर मुंबई में ही रुकेंगे। जिसके बाद वो अपनी पहली पत्नी से अलग हो गए।

-31 जुलाई 1980 को जब रफी साहब इस दुनिया को अलविदा कह गए। मौत के बाद किशोर कुमार रफी के पैरों के पास ही बैठ कर घंटों तक बच्चों की तरह रोते रहे।

-मोहम्मद रफी का दिल काफी बड़ा था। एक बार उन्होंने अपनी कॉलोनी में एक विधवा को पैसे ना होने के कारण जूझते हुए देखा। उसके बाद से ही रफी ने पोस्ट ऑफिस के जरिए एक अनजान व्यक्ति के नाम से हर महीने उस विधवा को पैसे भेजना शुरू कर दिए।