पशु वध: अधिसूचना में बदलाव के लिए केंद्र सरकार तैयार

प्रभाकर मिश्रा, नई दिल्ली (11 जुलाई): केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि राज्यों में मार्किट के एस्टेब्लिशमेंट का सर्वे किया जा रहा है और सरकार इस अधिसूचना में कुछ संशोधन की भी तैयारी कर रही है। जिसे अगस्त तक कर दिया जाएगा।


सरकार ने बताया है कि अगले 3 महीने तक वध के लिए पशुओं की बिक्री पर रोक लगाने वाले कानून को लागू नहीं करेगी।


- सुप्रीम कोर्ट ने मामले में विभिन्न याचिकाओं का निपटारा करते हुए केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि जब वो नया अधिसूचना जारी करेगी तो उसे लागू करने के लिए पर्याप्त समय सीमा रखे, ताकि किसी नयी अधिसूचना  से दिक्कत हो तो वह इसके खिलाफ कोर्ट में आ सके। सुप्रीम कोर्ट ने मद्रास हाईकोर्ट के मदुरै बेंच के उस आदेश पर मुहर लगाई है जिसमें हाईकोर्ट ने 26 मई की केंद्र सरकार की उस अधिसूचना पर रोक लगा दी थी जिसमें पशुओं के वध के लिए बिक्री पर रोक लगाने की बात कही गयी थी।


हैदराबाद निवासी एक याचिकाकर्ता मोहम्मद अब्दुल फहीम कुरैशी ने सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में दावा किया था कि केंद्र सरकार की अधिसूचना असंवैधानिक है क्योंकि यह धार्मिक स्वतंत्रता (जानवरों की बलि देने की धार्मिक परंपरा)और आजीविका के मौलिक अधिकारों का हनन करती है। याचिका में कुरैशी ने कहा था कि केरल, पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा और कर्नाटक जैसे राज्यों ने केंद्र के इस प्रतिबंध को लागू करने से इन्कार कर दिया है क्योंकि इससे इस व्यवसाय से जुड़े लोगों की आजीविका प्रभावित होगी।


याचिकाकर्ता का कहना है कि पशुओं की बिक्री या खरीद या पुन: बिक्री पर पूर्ण प्रतिबंध से किसानों और मवेशी व्यापारियों पर आर्थिक बोझ काफी बढ़ जाएगा। क्योंकि पशु क्रूरता रोकथाम अधिनियम, 1960 के तहत पशुओं को भोजन उपलब्ध कराना आवश्यक है। अधिनियम के तहत पशुओं को भूखा रहना या उनका भरण-पोषण न करना एक अपराध है। लिहाजा, इस अधिसूचना से गोरक्षकों को किसानों और मवेशी व्यापारियों का उत्पीड़न करने का मौका मिल जाएगा। याचिका में कहा गया था कि 1960 के कानून में खाने के लिए पशु वध या धार्मिक पशु बलि पर रोक या प्रतिबंध नहीं लगाया गया था और न ही इसके तहत पशुओं की बिक्री पर रोक लगाई गई थी। कुरैशी का दावा है कि देश में पशुओं के वध पर पूर्ण रोक से न सिर्फ बूचड़खानों का रोजगार प्रभावित होगा बल्कि पशुओं का व्यापार करने वाले भी प्रभावित होंगे। इसके अलावा नागरिकों को उनकी पसंद के भोजन के अधिकार से भी वंचित किया जा रहा है।