IS की वजह से फैली मानव-त्वचा को खा जाने वाली बीमारी, यूरोप में भी दस्तक!

नई दिल्ली (31 मई) : संभावना है कि मध्य पूर्व से आई एक बहुत ही घातक बीमारी ने यूरोप में भी दस्तक दे दी है। इस बीमारी के वाहक वो शरणार्थी हैं जो गृह युद्ध की मार झेल रहे सीरिया या मध्य पूर्व के अन्य देशों से पलायन कर चुके हैं। यह बीमारी  लीशमानिया (प्रोटोजोअन पैरासाइट) की वजह से होती है। ये पैरासाइट मानव की त्वचा का भक्षण कर सकते हैं। सैंडफ्लाई की विशेष प्रजाति के काटने से ये बीमारी फैलती है।  

2000 से 2012 के बीच 12 साल की अवधि में लेबनान में इस बीमारी (कुटेनियस लीशमानियाइसिस) के कुल 6 मामले सामने आए। लेकिन 2013 में इन मामलों में अचानक तेज़ी आई और 1033 केस रिपोर्ट हुए। लेबनान के स्वास्थ्य मंत्रालय के मुताबिक इस बीमारी के 96 फीसदी मामले सीरिया से विस्थापित होकर आए लोगों में देखे गए।  

'न्यूज़ डॉट कॉम डॉट एयू' की रिपोर्ट के मुताबिक  इस बीमारी के फैलने की बड़ी वजह मध्य पूर्व में युद्ध की मार झेल रहे इलाकों में फैली गंदगी है। कुर्दिश रेड क्रीसेंट (केआरसी) इसके लिए आतंकी संगठन इस्लामिक स्टेट (आईएस) को जिम्मेदार ठहराता है। केआरसी का कहना है कि आईएस के आतंकी शवों को गलियों में ही गाड़ देते हैं, जिनके सड़ने से ये बीमारी फैलती है। हालांकि स्कूल ऑफ ट्रॉपिकल मेडिसन केआरसी के दावों से इत्तेफाक नहीं रखती।   

इस बीमारी के शिकार लोगों की त्वचा पर घाव, नाक से खून बहने आदि की शिकायत होती है। सांस लेने में तकलीफ के साथ नाक सूज जाती है। समुचित मेडिकल सुविधाओं के अभाव में और पानी की कमी की वजह से इस बीमारी का प्रकोप और बढ़ जाता है। तब पैरासाइट मरीज के नाक, मुंह और गले की त्वचा को ही खाना शुरू कर देता है।   

अब तक इस बीमारी के मरीज सीरिया में आईएस नियंत्रित इलाकों जैसे कि रक्का, देई अल ज़ाउर, हसाका में ही देखे गए थे। लेकिन अब पैरासाइट मध्य पूर्व के बाहर भी जड़े फैला रहा है। तुर्की, जॉर्डन औ यमन में इस बीमारी के सैकड़ों मामले सामने आए हैं। बहुत संभावना है कि इसका असर सऊदी अरब तक भी बढ़ जाए।

स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि मानव की त्वचा को खाने वाला ये पैरासाइट बहुत संभव है कि यूरोप तक पहुंच चुका हो। इसके वाहक अस्थाई शिविरों में रह रहे शरणार्थी हो सकते हैं। इन कैंपो में भीड़भाड़, कम साफ सफाई और अपर्याप्त मेडिकल सुविधाओं की वजह से मरीजों की संख्या बढ़ सकती है।

लीवरपूल स्कूल ऑफ ट्रॉपिकल मेडिसिन के डॉ वलीद अल  सलेम का कहना है कि पैरासाइट की वाहक सैंडफ्लाई आकार में मच्छर से छोटी होती है। सैंडफ्लाई के काटने के दो से छह महीने बाद बीमारी के लक्षण दिखाई देने लगते हैं। यूएस नेशनल स्कूल ऑफ ट्रॉपिकल मेडिसिन के डीन पीटर होएत्ज़ का कहा है कि इस बीमारी से उत्पन्न हालात कुछ कुछ वैसे ही हैं जैसे कि पश्चिम अफ्रीका में 2014 में इबोला बीमारी के फैलने के वक्त हुए थे।