मैकमहोन लाइन को भी मानने से इंकार करता है चालबाज चीन

नई दिल्ली (3 जुलाई): भले ही भारत के लोग पाकिस्तान को अपना सबसे बड़ा दुश्मन मानते हों, लेकिन इस समय देश को सबसे बड़ा खतरा चालबाज चीन से है। हमारा पड़ोसी चीन अर्थिक और सैन्य दोनों में हमसे बहुत ज्यादा मजबूत है। इसके साथ ही वह पाकिस्तान को भी आर्थिक मदद करके भारत को हमेशा युद्ध में धकेलने की रणनीति में लगा रहता है।


वैसे भारत और चीन के बीच कोई विवाद नहीं है, लेकिन चीन बेवजह ही विवाद करके भारत को उकसाना चाहता है। मैकमोहन लाइन के जरिए अंग्रेजों ने चीन और भारत का बॉर्डर तय कर दिया था, परन्तु चीन आज उसे मानने को भी तैयार नहीं है।


क्या है मैकमहोन लाइन...

मैकमहोन लाइन भारत और तिब्बत के बीच सीमा रेखा है। यह अस्तित्व में सन् 1914 में भारत की तत्कालीन ब्रिटिश सरकार और तिब्बत के बीच शिमला समझौते के तहत आई थी। 1914 के बाद से अगले कई वर्षों तक इस सीमारेखा का अस्तित्व कई अन्य विवादों के कारण कहीं छुप गया था, किन्तु 1935 में ओलफ केरो नामक एक अंग्रेज प्रशासनिक अधिकारी ने तत्कालीन अंग्रेज सरकार को इसे आधिकारिक तौर पर लागू करने का अनुरोध किया। 1937 में सर्वे ऑफ इंडिया के एक मानचित्र में मैकमहोन रेखा को आधिकारिक भारतीय सीमारेखा के रूप में पर दिखाया गया था।


इस सीमारेखा का नाम सर हैनरी मैकमहोन के नाम पर रखा गया था, जिनकी इस समझौते में महत्त्वपूर्ण भूमिका थी और वे भारत की तत्कालीन अंग्रेज सरकार के विदेश सचिव थे। अधिकांश हिमालय से होती हुई सीमारेखा पश्चिम में भूटान से 890 किमी और पूर्व में ब्रह्मपुत्र तक 260 किमी तक फैली है। जहां भारत के अनुसार यह चीन के साथ उसकी सीमा है। वही, चीन 1914 के शिमला समझौते को मानने से इनकार करता है। चीन के अनुसार तिब्बतस्वायत्त राज्य नहीं था और उसके पास किसी भी प्रकार के समझौते करने का कोई अधिकार नहीं था।


चीन के आधिकारिक मानचित्रों में मैकमहोन रेखा के दक्षिण में 56 हजार वर्ग मील के क्षेत्र को तिब्बती स्वायत्त क्षेत्र का हिस्सा माना जाता है। इस क्षेत्र को चीन में दक्षिणी तिब्बत के नाम से जाना जाता है। 1962-63 के भारत-चीन युद्ध के समय चीनी फौजों ने कुछ समय के लिए इस क्षेत्र पर अधिकार भी जमा लिया था। इस कारण ही वर्तमान समय तक इस सीमारेखा पर विवाद यथावत बना हुआ है, लेकिन भारत-चीन के बीच भौगोलिक सीमा रेखा के रूप में इसे अवश्य माना जाता है।