मराठा आरक्षण पर आएगा सुप्रीम कोर्ट से फैसला

विनोद जगदाले, मुंबई (18 सितंबर): सुप्रीम कोर्ट से 19 सितंबर को आनेवाले मराठा आरक्षण के फैसले पर सभी की निगाहें लगी हुई है। महाराष्ट्र में इनदिनों मराठा समाज के लाखों की तादाद में आरक्षण और अट्रोसिटी के विरोध में मोर्चे निकल रहे है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले से महाराष्ट्र की अगली राजनीती का रुख तय होगा।

2014 में विधान सभा चुनाव से पहले महाराष्ट्र की पृथ्वीराज चव्हाण सरकार ने मराठा समाज को आर्थिक और सामाजिक तौर पर पिछड़े की श्रेणी में डालते हुए 16 फीसदी आरक्षण दिया था। इस आरक्षण के खिलाफ पूर्व पत्रकार केतन तिरोडकर द्वारा दाखिल जनहित याचिका में कहा गया है, 'मराठा समुदाय को सामाजिक एवं शैक्षणिक तौर पर पिछड़ा घोषित करने का राज्य सरकार का फैसला देश और संविधान के साथ धोखा है। इस फैसले ने संविधान के बुनियादी ताने-बाने से दगा किया है।'

नौकरी और उच्च शिक्षा में दिए गए इस आरक्षण पर बॉम्बे हाई कोर्ट ने रोक लगा दी थी। तब नवंबर 2014 में बॉम्बे हाइकोर्ट ने 1990 के मंडल आयोग और फरवरी 2000 के राष्ट्रीय पिछड़ी जाती आयोग का दाखिला देते हुए आरक्षण की मर्यादा 50% के बाहर चले जाने से मराठा समाज के आरक्षण पर रोक लगा दी थी।

सामाजिक कार्यकर्ता विनोद पाटिल ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया। सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में ये मांग की गई है कि हाई कोर्ट से मामले का 3 महीने में निपटारा करने को कहा जाए। सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में ये कहा गया है कि हाई कोर्ट ने साल भर से इस मसले पर सुनवाई नहीं की है। फरवरी से राज्य में नए सत्र के दाखिले की प्रक्रिया शुरू हो जाएगी। इसलिए हाई कोर्ट से मामले को तेज़ी से निपटाने को कहा जाए। महाराष्ट्र में ताकतवर मराठा बिरादरी के लिए आरक्षण का मुद्दा राजनीतिक रूप से काफी अहम है।

फिलहाल महाराष्ट्र के हर जिले में निकल रहे मराठा समाज के लाखों में मोर्चे ने सूबे में मुखिया देवेंद्र फडणवीस की नींद उड़ा दी है। आरोप है कि फड़णवीस सरकार हर बार मराठाओ को आरक्षण को लेकर कटिबद्ध होने की बात करती है, लेकिन कानूनी लड़ाई में कम पड़ जाती है। इतना तो तय है कि कल के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद फड़णवीस सरकार के लिए महाराष्ट्र में चुनौतियां कम नहीं होंगी।