'मेरी तेरहवीं हो गई है लेकिन मैं ज़िंदा हूं'

नई दिल्ली (2 जून) :  आज़मगढ़ के लाल बिहारी मृतक का किस्सा कुछ लोगों को याद होगा। लाल बिहारी को ज़िंदा होने के बावजूद सरकारी रिकॉर्ड्स में मृतक दिखा दिया गया था। लाल बिहारी को खुद को ज़िंदा साबित करने के लिए 1975 से लेकर 1994 तक 19 साल जद्दोजहद करनी पड़ी थी। अब वैसा ही कुछ वाराणसी के चौबेपुर के रहने वाले 35 वर्षीय संतोष मूरत सिंह को भुगतना पड़ रहा है।   

टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक संतोष वाराणसी से लेकर दिल्ली के जंतर-मंतर तक गले में तख्ती डालकर घूम रहा है। साथ ही चीख चीख कर कह रहा है कि 'मेरी तेरहवीं कर दी गई है लेकिन मैं ज़िंदा हूं।' संतोष की कहानी वर्ष 2000 से शुरू होती है। तब अभिनेता नाना पाटेकर गांव में फिल्म 'आंच'  की शूटिंग के लिए आए थे। उसी दौरान संतोष को नाना पाटेकर के संपर्क में आने का मौका मिला। संतोष का दावा है कि नाना उन्हें मुंबई ले गए और वहां संतोष ने उनके लिए कुक और ड्राइवर का काम किया। दो साल बाद संतोष ने महाराष्ट्र की एक दलित महिला के साथ शादी कर ली। शादी के छह महीने बाद संतोष पत्नी के साथ गांव आया तो वहां किसी ने उससे सीधे मुंह तक बात नहीं की। संतोष को खूब बुरा भला कहा गया और गालियां देकर घर से निकाल दिया गया। संतोष के मुताबिक उसका कसूर यही था कि उसने उच्ची जाति (ठाकुर) का होने के बावजूद दलित महिला से शादी कर ली। सारे गांव ने ही संतोष का बहिष्कार कर दिया।

संतोष पत्नी को लेकर ये सोच कर मुंबई लौट गया कि समय के साथ गांव के लोगों का गुस्सा शांत हो जाएगा। संतोष को पता नहीं था कि उसके साथ क्या होने जा रहा है। संतोष को कुछ अर्सा बीतने के बाद पता चला कि उसके चचेरे भाईयों ने उसे मृत घोषित कर उसका अंतिम संस्कार कर दिया है। इसके लिए मुंबई 2006 धमाकों की एक लावारिस लाश को संतोष की लाश बताया गया। साथ ही संतोष की मौत का सरकारी सर्टिफिकेट भी ले लिया गया। संतोष की पुश्तैनी 12.5 एकड़ ज़मीन हड़पने के लिए ये सब किया गया।

उस दिन के बाद से ही संतोष खुद को ज़िंदा साबित करने के लिए दर दर भटक रहा है लेकिन उसकी कोई सुनवाई करने वाला नहीं है। संतोष का दावा है कि 2012 में वो जंतर-मंतर पर धरने पर बैठा था तो नाना पाटेकर और नसीरुद्दीन शाह भी मिलने के लिए आए थे।

संतोष बनारस के डीएम से लेकर यूपी के सीएम तक से कई बार मिलकर सरकारी दस्तावेजों में जिंदा होने की गुहार लगा चुका है। लेकिन अभी तक वह जिंदा होकर भी जिंदा नहीं है।  संतोष के मुताबिक उसके जिंदा होने के संघर्ष को देखते हुए मुंबई प्रशासन ने जिस स्टेटमेंट में यह कहा था कि संतोष की मुंबई ब्लास्ट में मृत्यु हो गई है, उसे निरस्त कर दिया गया। इसके बाद भी अभी तक ज़मीन और घर वापस नहीं मिला है।  संतोष का कहना है कि जब तक सरकारी दस्तावेजों में खुद को ज़िंदा साबित नहीं कर लूंगा तब तक संघर्ष जारी रखूंगा।