कश्मीर हिंसा से निपटने में फेल रही महबूबा सरकार?

आसिफ सुहाग, श्रीनगर (11 जुलाई): एक आतंकी की मौत होती है और जन्नत शोला बन जाती है। पिछले कुछ दिनों से घाटी में माहौल काफी गरम चल रहा है। उपद्रवियों को काबू करने में जुटे जम्मू-कश्मीर पुलिस के जवान भी शहीद हुए हैं। 400 से ज्यादा लोग घायल हैं, 100 पुलिसवालों को भी चोटें आई हैं। ऐसा नहीं है कि घाटी में सबकुछ अचानक हुआ है। ऐसा भी नहीं है हालात सिर्फ हिजबुल मुजाहिदीन के टॉप कमांडर बुरहान मुज़फ़्फ़र वानी के मारे जाने की वजह बिगड़े हैं, कई मुद्दों ने कश्मीर को बारुद बना दिया था।

सैनिक कॉलोनी, पंडित कॉलोनी, नई इंडस्ट्रियल पॉलिसी और अलगाववादियों के लिए मुफ्ती सरकार का सॉफ्ट कॉर्नर। इन सब ने हाफिज़ और सलाउद्दीन जैसे आतंक के आकाओं को हरकत में ला दिया और कश्मीर जल उठा। पिछले कुछ महीनों में ऐसे कई वाकये हुए जब आतंकियों को कश्मीर में बड़ी तादात में लोकल सपोर्ट मिला। ऐसे में एक पोस्टर ब्वॉय के मारे जाने के बाद इस तरह की समस्या खड़ी होगी। इससे भी महबूता मुफ्ती की सरकार अनजान नहीं थी, फिर भी महबूबा ने अलगाववादियों और आतंकियों के खिलाफ सख्ती नहीं दिखाई। सेना की जगह उपद्रवियों से निपटने के लिए जम्मू-कश्मीर की पुलिस से ही काम चलाया और नतीजा ये हुआ कि एक आतंकी की मौत से लगी आग बेकाबू हो गई।

पिछले साल जब पीडीपी और भाजपा गंठबंधन के नेता के तौर पर मुफ्ती मोहम्मद सईद मुख्यमंत्री बने तो ये उम्मीद बंधी थी कि केंद्र की मोदी सरकार के सहयोग से राज्य में भरोसे की बहाली होगी, लेकिन सारी उम्मीदें नाकाम साबित हो गईं। कश्मीर घाटी में एक बार फिर 1990 के हालात बन गए हैं।